सावन के तीसरे सोमवार की भोर, जब पूरा देश महादेव की भक्ति में लीन था, बिहार के लखीसराय स्थित ऐतिहासिक अशोकधाम मंदिर परिसर में आस्था का सैलाब खूनी मंजर में तब्दील हो गया। भगवान शिव के जलाभिषेक की आतुरता में उमड़ी अनियंत्रित भीड़ ने देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लिया। मंदिर के संकरे प्रवेश द्वार और बैरिकेडिंग के पास मची अफरा-तफरी के बीच सात महिलाओं की जान चली गई, जबकि 19 श्रद्धालु गंभीर रूप से घायल हो गए। चीख-पुकार से गूंजते मंदिर परिसर की तस्वीरें किसी युद्धक्षेत्र जैसी भयावह थीं, जहाँ चप्पलें बिखरी पड़ी थीं और अपनों को तलाशते लोगों का रुदन हर पत्थर को नम कर रहा था।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घटना की नींव सुबह करीब 4 बजे ही पड़ गई थी, जब कांवरियों और स्थानीय श्रद्धालुओं की संख्या क्षमता से कहीं अधिक हो गई। मंदिर प्रशासन द्वारा की गई बैरिकेडिंग एक तरफ तो सुरक्षा कवच थी, लेकिन भीड़ के भारी दबाव में यही 'डेथ ट्रैप' साबित हुई। एक अफवाह उड़ी कि मंदिर के कपाट बंद किए जा रहे हैं, जिसके बाद पीछे से आने वाली भीड़ ने आगे की ओर जोर का धक्का दिया। संकरी गलियों में फंसे लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरते चले गए। भगदड़ का यह सिलसिला महज 15-20 मिनट तक चला, लेकिन यह समय काल बनकर आया, जिसमें दम घुटने और दबने से सात महिलाओं की प्राण-पखेरू उड़ गए।
प्रशासन की नाकामी और भीड़ प्रबंधन में चूक का यह एक और काला अध्याय है। सावन के सोमवार पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं, यह जानते हुए भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नाकाफी रहे। स्थानीय लोगों का आरोप है कि मंदिर के मुख्य द्वार पर न तो पर्याप्त पुलिस बल तैनात था और न ही इमरजेंसी एग्जिट की उचित व्यवस्था। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लगे बैरिकेड्स ने ही लोगों को बाहर निकलने का रास्ता नहीं दिया, जिससे स्थिति और भी विकट हो गई। हालांकि, जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए घायलों को सदर अस्पताल पहुंचाया और राहत कार्य शुरू किया, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी की जान जाने के बाद ही हम जागेंगे?
यह त्रासदी केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि हमारे उस सिस्टम पर एक सवालिया निशान है जो धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा को 'भगवान भरोसे' छोड़ देता है। अशोकधाम मंदिर, जो अपनी प्राचीनता और भव्यता के लिए जाना जाता है, आज प्रशासन की लापरवाही का पर्याय बन गया है। सावन के महीने में बिहार के मंदिरों में उमड़ने वाली भीड़ कोई नई बात नहीं है, फिर भी हम भीड़ नियंत्रण के लिए तकनीक, सीसीटीवी सर्विलांस या 'क्राउड डेंसिटी मैपिंग' का उपयोग करने में कोसों दूर हैं। भगदड़ के बाद सरकार द्वारा मुआवजे की घोषणा और उच्च स्तरीय जांच के वादे तो हर बार होते हैं, पर क्या ये कदम भविष्य में होने वाली ऐसी त्रासदियों को रोक पाएंगे?
अंततः, आस्था का अर्थ शांति और कल्याण है, न कि अव्यवस्था और मौत। शोक की इस घड़ी में पूरा प्रदेश उन परिवारों के साथ है जिन्होंने सावन के इस पवित्र दिन पर अपने प्रियजनों को खो दिया। मुख्यमंत्री ने घटना पर दुख व्यक्त करते हुए जांच के आदेश दे दिए हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि तीर्थस्थलों पर 'क्राउड मैनेजमेंट प्रोटोकॉल' को अनिवार्य बनाया जाए। जब तक मंदिरों में दर्शन के लिए डिजिटल टोकन सिस्टम, कतारों का उचित प्रबंधन और आपातकालीन निकास के सख्त नियम लागू नहीं होंगे, तब तक आस्था का यह महाकुंभ यूं ही जानलेवा बनता रहेगा। आज लखीसराय की मिट्टी महादेव के आंसुओं से भीगी है, और यह जिम्मेदारी हम सबकी है कि अगली बार किसी का सुहाग या किसी की मां इस तरह अकाल न छीनी जाए।