भारत को 'त्योहारों का देश' कहा जाता है, जहाँ हर त्योहार किसी न किसी मौसम परिवर्तन, कृषि चक्र या धार्मिक कथा से जुड़ा होता है। ऐतिहासिक रूप से, त्योहार केवल पूजा-पाठ के अवसर नहीं थे, बल्कि वे पूरे गाँव और समाज को एक सूत्र में पिरोने वाले सांस्कृतिक सेतु थे। हालाँकि, उपभोक्तावाद और बाजारवादी ताकतों के प्रभाव में आकर आज त्योहारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। त्यौहार अब सामुदायिक जुड़ाव के बजाय मुख्य रूप से 'खरीदारी के भव्य अवसरों' और 'छूट की बिक्री' में तब्दील होते जा रहे हैं।
इस व्यावसायिकरण का सबसे स्पष्ट प्रभाव त्योहारों को मनाने के तरीकों में देखा जा सकता है। जहाँ पहले होली का रंग प्राकृतिक फूलों से घर पर बनाया जाता था और दिवाली पर मिट्टी के दीये जलाकर मिठाइयाँ घर में बनती थीं, वहीं अब तैयार सामान, विदेशी रोशनी की लरियाँ और ब्रांडेड उपहार के डिब्बों ने उनका स्थान ले लिया है। बाजार ने हमारे त्योहारों को 'उपहार संस्कृति' से जोड़ दिया है, जिससे त्योहारों की आत्मीयता की जगह दिखावा और सामाजिक प्रतिष्ठा हावी हो गई है। जो लोग महंगे उपहार देने में असमर्थ हैं, वे एक अनजाने सामाजिक हीनभावना का शिकार हो रहे हैं।
इस बदलाव का एक और दुखद पहलू है त्योहारों की 'सामूहिकता' का खत्म होना। पुराने समय में त्योहार पूरे मोहल्ले या गाँव द्वारा मिलकर मनाए जाते थे, जिससे आपसी मतभेद भूलकर सामाजिक समरसता बढ़ती थी। आज के शहरी जीवन में, त्योहार केवल अपने छोटे परिवार तक सीमित हो गए हैं या फिर केवल सामाजिक-संजाल पर 'शुभकामना' भेजने की एक औपचारिकता मात्र रह गए हैं। सार्वजनिक पंडालों और आयोजनों में भी अब भक्ति और संस्कृति से ज्यादा प्रायोजक, तेज संगीत और व्यावसायिक विज्ञापन हावी रहते हैं।
हालाँकि, इस सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि व्यावसायिकरण ने कई कुटीर उद्योगों और स्थानीय कारीगरों को एक बड़ा बाजार उपलब्ध कराया है। दिवाली या दुर्गा पूजा के दौरान हजारों करोड़ रुपये का व्यापार होता है, जिससे लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब व्यापार ही त्योहार का मुख्य उद्देश्य बन जाए और उसके पीछे की सांस्कृतिक, पर्यावरण-अनुकूल और आध्यात्मिक चेतना पूरी तरह से लुप्त हो जाए। पटाखों से होने वाला प्रदूषण या प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों से नदियों का प्रदूषण इसी सोच की देन है।
इसलिए, आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने त्योहारों के मूल उद्देश्य और उनकी सांस्कृतिक आत्मा को पहचानें। हमें बाजार के उस दबाव से बाहर निकलना होगा जो हमें यह बताता है कि उत्सव मनाने का मतलब केवल उपभोग करना है। अपनी भावी पीढ़ी को त्योहारों के पीछे छिपे पर्यावरण प्रेम, आपसी भाईचारे और सद्भाव के मूल्यों से परिचित कराना होगा। त्योहार तभी सार्थक हैं जब वे हमारे दिलों को जोड़ें और समाज में खुशहाली लाएँ, न कि केवल हमारे बैंक खातों को खाली करें।