Cult Current ई-पत्रिका (फरवरी, 2025 ) : महाकुंभःसंस्कृति के संगम में अध्यात्म की दिव्यता
संदीप कुमार
| 01 Feb 2025 |
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भारत की पावन धरा पर स्थित प्रयागराज, जहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की पवित्र धाराएं एकाकार होती हैं, वह स्थान मात्र भौगोलिक मिलन नहीं, बल्कि अध्यात्म और संस्कृति का महासंगम है। यह वह भूमि है, जो सहस्राब्दियों से साधकों, ऋषियों और संतों की साधनाओं का केंद्र रही है। कुंभ का आयोजन इस संगम पर महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समग्र भारतीय संस्कृति का उत्सव है, जो हमें हमारी सभ्यता की गहराईयों से जोड़ता है।
कुंभ मेले की परंपरा सहस्राब्दियों पुरानी है, जिसे पौराणिक कथा से भी जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन के समय जब अमृत कलश को लेकर संघर्ष हुआ, तो उसकी कुछ बूंदें पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरीं—प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, और नासिक। इन चारों स्थलों पर कुंभ मेले का आयोजन हर बारह वर्ष में होता है। किंतु प्रयागराज का महाकुंभ विशेष है, क्योंकि यह केवल बारह वर्षों का नहीं, बल्कि एक संपूर्ण चक्र का प्रतीक होता है, जो हर 144 वर्षों में एक बार आता है। यह वह समय होता है जब असंख्य श्रद्धालु, साधु-संत और योगी संगम तट पर इकट्ठे होते हैं, अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए इस पवित्र स्थल पर स्नान करते हैं और स्वयं को आध्यात्मिक यात्रा में लीन कर देते हैं।
इस वर्ष का महाकुंभ विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें लगभग 45 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की संभावना जताई गई है। यह मात्र संख्या का खेल नहीं, यह उस आस्था का प्रतीक है जो भारत के हर कोने से लेकर विश्व के कोने-कोने तक फैली हुई है। हर श्रद्धालु, चाहे वह गरीब हो या धनी, यहां आकर संगम के जल में डुबकी लगाकर स्वयं को शुद्ध करता है, अपने भीतर की अशुद्धियों को दूर करता है और एक नवीन जीवन की ओर कदम बढ़ाता है। यह केवल धार्मिक आस्था का ही पर्व नहीं है, यह समरसता और मानवता की विजय का प्रतीक भी है। जब संगम की माटी पर लाखों-करोड़ों लोग इकट्ठे होते हैं, तो वे केवल स्नान नहीं करते, वे उस अद्वितीय आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं जो सहस्राब्दियों से इस धरा पर संचित है। कुंभ का यह संगम मानवता के लिए अमृत के समान है, जो जीवन को शुद्ध करता है और आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर करता है।
कल्पवास: तप का यज्ञ
कुंभ के समय संगम तट पर साधु-संतों और श्रद्धालुओं का विशेष आकर्षण होता है 'कल्पवास'। यह केवल स्नान करने की क्रिया नहीं, बल्कि जीवन की एक संपूर्ण साधना है। कल्पवास वह समय है जब श्रद्धालु एक माह तक संगम तट पर निवास करते हैं, अपनी दैनिक जीवन की साधारणता को छोड़कर तपस्वियों की भांति जीवन जीते हैं। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना, तीन बार पवित्र जल में स्नान करना, और एक समय भोजन करना, ये सभी क्रियाएं कल्पवास के नियम हैं। यह तपस्वी जीवन केवल बाहरी अनुशासन नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का एक माध्यम है। जब व्यक्ति संगम के शीतल जल में स्नान करता है, तो वह केवल शरीर को शुद्ध नहीं करता, बल्कि वह अपने भीतर की अपवित्रताओं से भी मुक्ति प्राप्त करता है। कल्पवास का यह यज्ञ उस आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है, जो हमें भौतिकता से दूर करके आत्मा के सत्य स्वरूप की ओर ले जाता है।
समरसता और एकता का संगम
कुंभ मेला केवल धार्मिक उत्सव नहीं, यह सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है। यहां कोई जाति, धर्म या वर्ग का भेदभाव नहीं होता। लाखों श्रद्धालु चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि के हों, संगम के पवित्र जल में एक साथ स्नान करते हैं और एक समान अनुभव प्राप्त करते हैं।
यह मेला मानवता की उस विशाल एकता का प्रतीक है, जो हमें यह सिखाता है कि हम सभी एक ही स्रोत से उत्पन्न हुए हैं। यहां आकर हर व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसका उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति है। कुंभ का यह अद्वितीय आयोजन उस सांस्कृतिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करता है, जो सहस्राब्दियों से भारतीय समाज को एकता और प्रेम के सूत्र में बांधती आई है।
शाही स्नान व अखाड़े
कुंभ के दौरान होने वाले शाही स्नान और अखाड़ों की पारंपरिक शोभायात्रा इस मेले की भव्यता को और भी अद्भुत बनाते हैं। नागा साधुओं की विशाल टोलियां, हाथियों पर सवार साधु-संत और पारंपरिक वेशभूषा में आभूषणों से सुसज्जित साधु जब संगम की ओर बढ़ते हैं, तो यह दृश्य किसी दिव्य लोक की यात्रा के समान होता है।
यह शोभायात्रा केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है, जो हमें हमारे सनातन धर्म की गहराईयों से जोड़ती है। अखाड़ों के नागा साधु अपनी तपस्वी परंपरा को धारण करते हुए कुंभ में भाग लेते हैं, और यह संदेश देते हैं कि आध्यात्मिक शक्ति और भक्ति का समर्पण किसी भी भौतिक उपलब्धि से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
वैश्विक आकर्षण: महाकुंभ का अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व
आज का महाकुंभ केवल भारतीयों का नहीं रहा, यह वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है। दुनिया के कोने-कोने से श्रद्धालु और पर्यटक इस अद्वितीय आयोजन का हिस्सा बनने आते हैं। विदेशी श्रद्धालु न केवल आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने आते हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं का गहन अध्ययन भी करते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में महाकुंभ का आकर्षण इस्लामिक देशों में भी बढ़ा है। पाकिस्तान, कतर, यूएई और बहरीन जैसे देशों से लोग महाकुंभ के बारे में जानकारी प्राप्त करने में रुचि ले रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति और उसकी आध्यात्मिक धरोहर आज पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुकी है।
धर्म संसद: सनातन शक्ति का जागरण
महाकुंभ केवल आध्यात्मिक आयोजन नहीं है, यह राष्ट्र के भविष्य को दिशा देने वाला भी है। यहां होने वाली धर्म संसदें और सामाजिक संगठन एकत्र होकर राष्ट्र के समक्ष आने वाली चुनौतियों का समाधान खोजने का प्रयास करते हैं। राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत भी कुंभ के इसी धर्म संसद से हुई थी, और आज यह आंदोलन राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन चुका है।
2025 के महाकुंभ में भी सनातन धर्म की शक्ति का जागरण हो रहा है। यह आयोजन केवल अतीत की धरोहर को संजोने का नहीं, बल्कि आने वाले समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहने का भी संदेश दे रहा है।
अध्यात्म की महायात्रा
महाकुंभ में आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु एक अद्वितीय आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा बनता है। संगम में स्नान करने के बाद जब वह अपने घर लौटता है, तो वह केवल बाहरी शुद्धि ही नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और समृद्धि भी साथ लेकर जाता है। कुंभ का यह आयोजन एक ऐसा दर्पण है, जो हमें हमारे जीवन के सत्य और उद्देश्य से परिचित कराता है।
संगम हमें यह सिखाती है कि जीवन के सभी कष्टों और संघर्षों का समाधान अध्यात्म और आस्था में निहित है। महाकुंभ का यह अनंत पर्व हमारे भीतर की चेतना को जाग्रत करता है, और हमें उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, जो हमें मोक्ष की ओर ले जाता है। महाकुंभ का अंतिम स्नान उस परमात्मा के साथ एकाकार होने का प्रतीक है, जो हमें हमारी अस्थाई देह से परे ले जाता है।