भारतीय राजनीति में नारों का इतिहास चुनावों से बहुत पुराना है. पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र, उनकी नीतियां सब अपनी जगह पर होते हैं मगर चुनाव में समां बांधने का काम चुनावी नारे ही करते नज़र आते हैं. किसी भी पार्टी का काम बगैर नारों के नहीं चल सकता. इसके लिए हाईकमान बड़े-बड़े लिक्खाड़ों को हायर करने तक तैयार रहते हैं. यह नारे ही उनकी हार या जीत सुनिश्चित करते हैं. नारे बहुत कुछ कर सकते हैं. इस देश में नारे ही असली माहौल बनाते हैं. नारा महिमा अपरम्पार है. नारे हैं तो हम हैं. सोशल मीडिया के इस क्रांतिकारी युग में आज भी परम्परागत नारों का महत्त्व कम नहीं हुआ है. भारतीय लोकतंत्र में राजनीति की गाड़ी नारों के भीड़तंत्र के पीछे-पीछे चलती है.
ज्यादा पीछे न जाते हुए हम नारों के पिछले सौ साल के इतिहास पर जाएं तो जब तिलक ने स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है कहा तो देशवासियों को अपने अधिकारों का ध्यान आया, नहीं तो हम गुलामी के अभ्यस्त हो चुके थे. एक नारे के बल पर अधिकार नाम की चिड़िया से हमारा परिचय कराने के कारण बाल गंगाधर तिलक इतिहास में अमर हो गये. एक मुकम्मल नारा देने से पहले नेतागण पहले किसी स्थान विशेष पर जनता को एकत्र करने के लिए पहले कोई उपनारा देते हैं जैसे स्वतंत्रता संग्राम के वक्त नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने पहले कहा दिल्ली चलो और और लोग दिल्ली की ओर कूच कर दिए. इसके बाद नेताजी ने अपना चिरस्मरणीय नारा तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा दिया. इधर नेताजी यह नारा लगाकर हमारे सोये हुए जमीर को जगा रहे थे वहीं दूसरी ओर अपने गांधी बाबा ने करो या मरो के बाद अंग्रेजों भारत छोड़ो जैसे अविस्मरणीय नारों की रचना कर एक बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया और उन्होंने सत्य और अहिंसा के दम पर अंग्रेजों को यहां से भगाकर ही दम लिया.
देश तो स्वतंत्र हो चुका था. लगा था कि नारों का काम भी ख़त्म हुआ, लेकिन नहीं. नारे कभी नहीं मरते. देश की आज़ादी के पहले जितने नारे लगते थे अब उससे दुगुनी मात्रा में नारे लगने लगे. देश की चुनौतियां नारों में तब्दील होकर सामने आईं. लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा लगाया. जिसे बाद में अटल जी ने जय जवान जय किसान जय विज्ञान में तब्दील कर अपना नाम दिया. तमाम प्रयासों के बावजूद समस्याओं ने विकराल रूप धारण कर लिया. तीन-तीन युद्ध और बीमारी तथा गरीबी से जनता त्राहि-त्राहि कर उठी. ऐसे समय में इंदिरा गांधी का उदय हुआ और उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा दिया. उन्होंने कहा चुनिए उन्हें जो सरकार चला सकें. कांग्रेस की तरफ से जात पर न पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मुहर लगेगी हाथ पर जैसे नारे लगाये जाने लगे. जिसका प्रभाव भी चुनाव बाद देखने को मिला. लेकिन यह जनता है सब जानती है. खाली नारे से उसका पेट नहीं भरता. लुभावने वादों और जोशीले नारों से आप कुर्सी तो पा सकते हैं लेकिन लम्बे समय तक जनता का प्यार नहीं. जनता का इंदिरा से मोहभंग हुआ और आपातकाल के बाद हुए चुनाव में दिनकर की प्रसिद्द कविता की पंक्ति ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ को ही नारा बना दिया गया.
इस घटनाक्रम के बाद देश में कई क्षेत्रीय पार्टियों का उदय हुआ. अब लड़ाई दो तरफ़ा न होकर चौतरफा थी. देश का आकाश नारों से गुंजायमान हो उठा. तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा लेकर बीएसपी सामने आई. बीएसपी का यह नारा सीधा-सीधा जात-पात के सियासी गणित पर आधारित था. इस नारे को फेल होता देख बीएसपी ने फ़ौरन अपना नारा बदल दिया और फिर एक साथ कई सारी आवाजें आई ‘चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगाओ हाथी पर’, ‘ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएसफोर’, ‘ब्राह्मण साफ़, ठाकुर हाफ, बनिया माफ़’, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है’. नारों के माध्यम से लोग सियासी वाकयुद्ध करने में मुब्तिला हो गये. नारों का जवाब नारों से दिया जाने लगा. राजा नहीं फ़कीर है, देश की तकदीर है वीपी सिंह के लिए बनाया गया नारा था. जिसका जवाबी नारा – राजा नहीं रंक है देश का कलंक है बना. समाजवादी पार्टी भी नारे देने में पीछे नहीं रही. जिसका जलवा कायम है उसका नाम मुलायम है उसका चुनावी नारा बना. यूपी में है दम क्योंकि यहाँ जुर्म है कम, जैसे नारे देकर जनता को आकर्षित करने की कोशिश की गयी.
तत्कालीन इंदिरा सरकार को नीचा दिखाने के लिए नारा गढ़ा गया - खा गयी चीनी पी गयी तेल, ये देखो इंदिरा का खेल. गली-गली में शोर है नारे को तो हर विरोधी दल के नेता ने पकड़ लिया. नारों के द्वारा नेताओं ही नहीं बल्कि दलों को भी नीचा दिखाने की कोशिश भारतीय लोकतंत्र में शान से की गयी. एक ज़माने में जनसंघ ने नारा लगाया था – जली झोपड़ी भागे बैल, ये देखो दीपक का खेल. जवाब में कांग्रेस का नारा भी आया – इस दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं.
जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू जैसा नारा तो उस समय बच्चे-बच्चे की जुबान पर सुना जा सकता था. बिहार के एक और लाल रामबिलास पासवान के समर्थकों ने नारा बुलंद किया - धरती खोजे आसमान, पासवान-पासवान. कांग्रेस में इंदिरा के बाद राजीव गांधी आये तो नारा दिया गया तूफ़ान में न आंधी में, विश्वास है राजीव गांधी में. जब सारे मुद्दे अन्य पार्टियों ने पकड़ लिए तो बीजेपी ने सत्ता प्राप्ति के लिए राम मंदिर का एक नया मुद्दा उछाल दिया और नारा दिया रामलला हम आयेंगें, मंदिर वहीँ बनायेंगें. एक तरफ उसके लोग अपनी पार्टी की हवा बनाने में लग गये वहीँ दूसरी ओर उसने कांग्रेस राज में हुए घोटालों को भी लेकर जनता के सामने पहुँची और उसने बोफोर्स घोटाले पर सरकार को घेरते हुए सेना खून बहाती है, सरकार कमीशन खाती है का नारा दिया.
नारा बनाना और फिर उसे अवाम तक पहुंचाना कोई हंसी ठट्ठा नहीं. नारे की सफलता इसी में हैं कि उसे बुलंद आवाज़ के साथ लगाया जाया. ख़राब हाजमे वाले नेताओं को नारा लगाने से परहेज करना चाहिए. वैसे भी नारे तो कार्यकर्ता लगाते हैं. नेता तो अपनी रणनीति के हिसाब से नारे सेट करता है और एक बार अपने भाषण के जरिये उस नारे का अपने मुखारविंद से लोकार्पण करता है. बाकी काम उसकी पार्टी का कार्यकर्ता करता है.
एक सफ़ल राजनीतिज्ञ बनने के लिए नारों का उचित ज्ञान अति आवश्यक है. मैं तो कहता हूँ कि सरकार को इसके लिए बाकायदा यूनिवर्सिटी में नारा विज्ञान की पढ़ाई करवानी चाहिए. जगह-जगह नारों के ट्रेनिंग सेंटर्स होने चाहिए. जहाँ भावी नेतागण नारों का अभ्यास कर सकें.
अब देखिये न चुनावपूर्व हर हर महादेव से हर हर मोदी निकला और चुनाव बाद मोदी घर-घर पहुँच गये. अब जनता मोदी से उनके चुनावी वादों का जवाब माँग रही है. जेएनयू फेम कन्हैया कुमार ने ज्यों ही नारा लगाया कि हम लड़ के लेंगें आज़ादी. वह पूरे देश भर में मशहूर हो गये. भला इससे पहले उन्हें कौन जानता था. यह नारे का ही चमत्कार था जिससे देश के सारे मुद्दे ख़तम कर दिए और सबको केवल जेएनयू का मुद्दा ही नज़र आने लगा. कन्हैया – तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है, देश की चिंता किसे है. तुम्हें प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर नारे का शुक्रिया अदा करना चाहिए. आज़ादी के इन नए नारों की शुरूआत के लिए देश आपका कोटि कोटि धन्यवाद ज्ञापित करता है.