नारी तो नारी है. इस समस्त सृष्टि की संचालिका-शक्ति का प्रतीक है नारी. ईश्वर कहें या प्रकृति या फिर जैविक विकासक्रम कहें, नारी को जन्म मिला सृष्टि की निरंतरता अक्षुण्ण रह सके, अतएव औरों को जन्म देने के लिए. पुष्ट शरीर, बलिष्ठ भुजाओं का धनी नर नारी का रक्षक बनने के अभिमान या अहंकार में चाहे जितना इतरा ले, लेकिन उसे जन्म देने वाली नारी अगर जीवन की आरंभिक अवस्था में उसकी रक्षा न करे, तो फिर नर के पास न पुष्ट शरीर हो, न बलिष्ठ भुजाएं. फिर भी पुरुष ने नारी को अपनी अर्द्धांगिनी कहा. पुरुष चाहता तो नारी को अपनी अर्द्धांगिनी कहने के बदले स्वयं को नारी का अर्द्धांग भी कह सकता था. लेकिन पुरुष ने ऐसा नहीं किया. पुरुष डरता है. पुरुष सदैव असुरक्षा की भावना के चंगुल में फंसा रहता है. पुरुष नारी का सामीप्य चाहता है. यह सामीप्य उसे कुछ अपना होने का अनुभव कराता है. यह बाध्यता है पुरुष की, यह दुर्बलता है पुरुष की. इसलिए पुरुष ने स्वयं को नारी का अर्द्धांग नहीं बल्कि नारी को अपनी अर्द्धांगिनी कहा. यह कुछ-कुछ अंगरेजी भाषा वर्ब टू हैव जैसी बात है. और पुरुष ने एक ढर्रा बना लिया, उसके बिना नारी की कोई गत नहीं. और पुरुष जीवन का यही सबसे बड़ा भ्रम है. नारी को समझने की भूल करने को अभिशप्त है पुरुष. तभी तो नारी को कोमलांगी, हिरनी, तन्वंगी, मृगनयनी न जाने किन-किन विशेषणों से अलंकृत करने की चेष्टा की गयी. नारी को अबला कहा गया. कवि ने नारी की नियति को “आँचल में दूध और आँखों में पानी” के साथ बाँध दिया.
ग्रंथों में नर अपनी शक्ति के लिए नारी-शक्ति का सहारा लेता है, इसके उदाहरणों की भरमार है. शासन संचालन में धरती के विभिन्न हिस्सों में निंदा और नफरत से लेकर आधुनिक प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों तक के अनेक उदाहरण हैं. किन्तु नारी के रूप और नारी के स्वरुप पर जितनी विषद चर्चा भारतीय साहित्यों में हुई उसकी मिसाल बहुत कम मिलती है. भारत में शक्ति के रूप में नारी की उपासना ने विभिन्न देवियों का उल्लेख किया गया. दुर्गा, भवानी, काली, गौरी, भगवती, लक्ष्मी, सरस्वती, वरुणेश्वरी, वागीश्वरी आदि अनेक नाम इनमें सम्मिलित हैं. हमारे यहाँ नदियों को भी देवी का रूप दिया गया. शास्त्रों के अनुसार समस्त सृष्टि के संचालक विष्णु का सारे कार्य लक्ष्मी की सहायता से ही सफल होते हैं. जन्म से लेकर मृत्यु तक, मानव जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जिसमें नारी-शक्ति का महत्व रेखांकित नहीं किया गया हो. यहाँ तक कि देवों और देवताओं के समक्ष भी जब कभी अपराजेय संकट आया, हर बार संकट के निवारण के लिए देवताओं की सर्वशक्तिमान सत्ता ने नारी का आह्वान किया और उनकी जाग्रत शक्ति के सहारे अपनी रक्षा की.
बचपन में भूख लगे तो “माँ खाना दो”. माँ नारी है. किशोरावस्था में बहिन से “ज़रा मेरा बिस्तर ठीक कर दो न”. बहिन नारी है. गार्हस्थ्य जीवन में पत्नी से “अजी सुनती हो, मेरा रुमाल कहाँ है?” पत्नी नारी है. विविध रूपों में नारी का अस्तित्व हमारे सामने उपस्थित होता है. कहा गया है कि हर सफल पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी का योगदान होता है. नारी संभाल देती है अनेक चीजों को. नारी है तो व्यवस्था है. अपने-अपने घरों में देख लो. भेज दो घर की नारियों को कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर. फिर देखो दो दिनों में घर की क्या हालत हो जाती है. नहीं संभाल पाते न चीजों को उस तरह जिस तरह सुबह जागने से लेकर रात में सोने तक एक नारी लगी रहती है किसी यंत्रचालित ढाँचे के सामान बिहा रुके, बिना थके. घर नहीं चल पाता ढंग से नारी के बिना, तो कैसे चले यह संसार नारी के बिना. सच तो यह है कि नारी है तो सृष्टि है. देवताओं का लोक नहीं चल पाता नारी के बिना, हम किस खेत की मूली हैं? लेकिन कुछ है. एक अहंकार है. एक भ्रम है. एक माया है. नारी जगत्जननी है, नारी मातृस्वरूपा है, नारी देवी है, नारी शक्ति है, नारी प्रेरणा है. ऋषियों ने कहा जहां नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है. और पुरुष को लगता है, नारी पर धौंस जमाने से उसके पौरुष की पहचान होती है. वह मूढ़मति नहीं जानता कि यह पुरुषत्व है. पुरुष की असली पहचान नारी के सम्मान से होती है.
जैविक अंतर को छोड़कर जीवन के किसी भी क्षेत्र में ऐसा कोई कार्य नहीं जो नारी नहीं कर सकती. विश्व का इतिहास नारियों के चमत्कारपूर्ण कार्यों के उदाहरणों से भरा है. विगत एक-डेढ़ सदियों में नारियों की भूमिका बढ़ी है और घर में भोजन पकाने से लेकर मानव सभ्यता को नित नए आयाम देने वाले कार्यों और भूगर्भ से लेकर अंतरिक्ष तक के रहस्यों से पर्दा हटाने जैसे सभी कार्यों में नारी बढ़-चढ़ कर अपनी उपस्थिति अंकित कर रही है. पौराणिक शीतला, षष्ठी, मनसा, इन्द्राणी, वाराही, माहेश्वरी, कुमारी, वैष्णवी, वैनायकी, गौरी, भूदेवी से लेकर पिछली सदी की सरोजनी नायडू, लाडो रानी जुत्थी, हंसा मेहता, अवन्तिका बाई गोखले, दुर्गा भाभी, लीलावती मुंशी और इस दौर की मेरी कॉम, मलाला युसुफजाई, अरुणिमा सिन्हा, एंजेला मर्केल, क्रिस्टीन लगार्ड, लेवार्ने कॉक्स, अनगिनत नाम हैं उन नारियों के जिन्होंने अपने-अपने कार्यक्षेत्र में नवोन्मेष और सफलता के साथ दुनिया को राह दिखाई है. कहा गया है कि आप एक नारी को शिक्षित करते हैं तो एक पूरी पीढ़ी शिक्षित होती है. इसे चरितार्थ करते हुए नारियों ने समाज के उन्नयन में, या यों कहें कि सृष्टि की अग्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है, लगातार कर रहीं हैं. प्राकृतिक और जैविक नियम जो भी हो, सामाजिक जीवन का सत्य यही है कि नारी है तो नर है. नारी ही सखा है, सहचर है. नारी अबला नहीं धरती के सामान सभी को धारण करने वाली और परिवार के कल्याण के लिए सब कुछ सहन करने वाली शक्ति का पुंज है. नारी बेचारी नहीं है, नारी समाज के लिए कल्याणकारी है. नारी कल भी भारी थी, नारी आज भी भारी है. पुरूष कल भी आभारी था, पुरूष आज भी आभारी है.