कहीं पीछे छूट गया गांव का गंवईपन

संदीप कुमार

 |  24 Oct 2020 |   340
Culttoday

गांव के दक्षिण में स्थित काली मां के मंदिर प्रांगण में और प्रांगण के बाहर गहमा-गहमी थी. मंदिर के गर्भगृह में मां काली की प्रतिमा के पास ही नीचे सात गोलाकार पिंड दिख रहे थे, जिन पर सिंदुर लगाया हुआ था. गर्भगृह में दिन का उजाला ना के बराबर था. मंदिर के द्वार के पास ही मलहोरिन बैठे –बैठे झूमते हुए गा रही थी- ‘मइया मोरी खेले ली झूमरिया, मइया तोरे बगिया ना...’ पास ही एक टोकरी में कुछ फल, बताशे व पकवान तथा एक तांबे के लोटे में लौंग-गुड़ युक्त छांक रखे हुए थे, दो फर्लांग की दूरी पर उपले की धीमी आंच पर मिट्टी के मटके रखा कराह उफान मार रहा था. मलहोरिन अपने हाथों में नीम की टहनी पकड़े अजीब हाव भाव (जैसे उसकी काया में देवी प्रवेश कर गई हों) के साथ झूम रही थी. प्रांगण में गांव के बड़े-बुजुर्गों के साथ-साथ सभी लोग भक्ति में डूबे थे. पूरा माहौल एक ऐसे सिद्धि स्थल का आभास करा रहा था कि शरीर के रोवें खड़े हो गये थे.

यह तब कि बात हैं जब मैं शायद पांचवीं-छठी का छात्र था. हालांकि यह दृश्य उस समय आम था. हर पूजा-पाठ के त्योहारी मौसम जैसे सवनी पूजा, फगुनी पूजा में इसी तरह के दृश्य होते थे और हम सब इसके अभ्यस्त होते हुए इसका बेसब्री से ना केवल इंतजार करते थे बल्कि अपने-अपने स्तर पर तैयारी भी करते थे.  नवरात्रि के दिनों की यह खास पूजा हुआ करती थी.

कुछ और दृश्य आज जेहन में तैरते हैं- सुबह अंधेरा छंटने से पहले ही गांव में बाल-गोपालों की धमाचौकड़ी शुरू हो जाती थी. बच्चे ढूंढ-ढूंढ कर फूल इक्कट्ठा करते. हरसिंगार की भीनी-भीनी खूशबू बच्चों की अपनी ओर आकर्षित करती और जमीन पर गिरे हरसिंगार और अन्य फूल डलिया की शोभा बढाते. पौ फटने के पहले ही किशोर उम्र के लड़के नहा-धो कर अपनी-अपनी साइकिल निकाल लेते. फिर साइकिल की हैंडल में फूल, बेलपत्र, अक्षत वाला छोटा सा थैला लटक जाता और फ्रेम में पतली डोर के सहारे जल से भरा लोटा भी लटका लिया जाता था. फिर एक,दो,तीन, चार.... फिर समूह में साइकिल सवार किशोरो की टोली चल पड़ती बम भोले के दरबार... बाबा महेंद्रनाथ मंदिर की ओर जलाभिषेक करने. यह सिलसिला पूरे नवरात्र चलता. गांव के बड़े-बुजुर्ग, नई-नवेली बहुरिया सहित बुजुर्ग महिलाएं गांव के शिवालय में पूजन व जलाभिषेक करती. एक प्रकार से सुबह के नौ बजे तक यही चलता. फिर इस प्रक्रिया से जैसे ही लोग निवृत होते तो फिर गांव में होने वाली रामलीला के लिए विभिन्न किरदार निभाने वाले अदाकार अपने-अपने किरदार का रिहर्ल्सल करने में लग जाते. स्थानीय संगीतकार रामलीला में संगीतमय प्रस्तुती के लिए ढोल, झाल, तासा इत्यादि वाद्ययंत्रों की जांच-परख में लग जाते. कुछ स्टेज सज्जा के विशेषज्ञ भी होते थे- वे अपने कार्य में मग्न हो जाते. लेकिन इन सबके इतर एक समानांतर टोली भी सक्रिय हुआ करती थी. संसाधन कम थे, लिहाजा घरेलू वस्तुएं ही कार्य साधन का विकल्प हो जाता. यह टोली नवरात्र के मौके पर हनुमान की प्रतिमा रख पूजा करते, लिहाजा इसके लिए तिरपाल, साड़ी-धोती, रंगीन कागज के मंडप बनाते. कुछ किशोर- युवा प्रतिमा लाने के लिए बैलगाड़ी (जिसे आम तौर पर भोजपुरी में टायर नाम से भी संबोधित किया जाता है. )  ले कर रवाना हो चुके होते. ऐसा शायद ही कोई नजर आता जो थोड़ी फूर्सत में दिखता हो. घर-घर में देवी दूर्गा के नौ रूपों की अराधना के लिए कलश स्थापन की प्रक्रिया चलती है, बगैर किसी लाउडस्पीकर के ही ‘या देवी सर्वभूतेषू....’ के मंत्रोच्चार से गांव की फीजा गूंज उठती है. शाम होते ही हनुमान जी प्रतिमा के समक्ष बांस के फट्ठे-लाठी को भांजने का खेल, जिसे स्थानीय भाषा में गदका खेलना भी कहते हैं. इस खेल को खेलते हुए उत्साहित बालवीर अपना करतब औऱ जौहर दिखाने लगते. उधर, हनुमान जी की पूजा के बाद रोट-पंजीरी की प्रसाद भी बंटने लगती. तभी कानों में ‘सब नर करहिं परस्पर प्रीती. चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीती... ’ सुनाई देता. इसका मतलब कि अब रामलीली के आगाज का वक्त हो चला है. रामलीला में लोक के राम की मनभावन कथा का मंचन तो होगा ही, साथ ही हंसी –ठिठोली वाली नाट्य प्रस्तुतियां भी होंगी.

वर्तमान समय में ऐसी कोई विधा नहीं है, कोई शिल्प नहीं है, जिसमें राम और शक्ति का बखान ना हुआ हो. शायद इसी को ध्यान में रखते हुए महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने ‘राम की शक्ति पूजा’ लिखी होगी. भारतीय साहित्य में शक्ति और राम की महिमा के अनेको उदाहरण मिल जाएंगे. जैसी ही देवी शक्ति का नाम कर्णपत्र पर पड़ते हैं, वैसे ही शक्ति के सभी रूप दिमाग में तैरने लगते हैं. इसी भक्तिभाव औऱ श्रद्धा के अतिरेक के रूप में हमने हाल ही गांव-गांव के कथित ‘कोरोना माई’ की पूजा भी देखी. हालांकि इसे कभी भी जायज नहीं ठहराया जा सकता लेकिन इसके पीछे देवी शक्ति के प्रति श्रद्धा और उनके कोप का भय से भी इनकार नहीं किया जा सकता. भोजपुरिया समाज के जनमानस में देवी शक्ति इस तरह से समाई हुई हैं कि किसी भी मुसीबत के समय बस वहीं एक सहायक के तौर पर नजर आती है. दूसरी ओर भगवान श्रीराम की जिन्दगी को दर्शाने के लिए सबसे लोकप्रिय मनोरंजक नाटक रामलीला है. रामलीला के केंद्र में अगर कोई है तो सिर्फ और सिर्फ राम ही हैं. हर रूप में, पूरे संयम के साथ, पूरे मर्यादा के साथ. वह तनिक भी अपनी मर्यादा से डिगते नहीं दिखते. राम जीवन दर्शन हैं औऱ इसी जीवन दर्शन से भोजपुरी समाज अघाया हुआ है.    

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लेकिन बीते तीन दशक में भोजपुरिया क्षेत्र में अनेको बदलाव आए हैं. इसका एक खास कारण है. रोजी-रोजगार के चक्कर में लोग कोलकाता, दिल्ली, सूरत, पंजाब, मुंबई सहित अनेको शहर औऱ देशों की ओऱ पलायन किये और फिर वहां से लौटे तो अपने साथ वहां की स्मृति, कला, संस्कृति, रीति-रिवाज लेकर लौटे. परिणामतः भोजपुरिया संस्कृति में मां दुर्गा का लकदक मंडप, रावण का पुतला दहन, गरबा वगैरह शामिल होते गए. इससे भोजपुरिया संस्कृति का दायरा तो बढ़ा औऱ वह और संपन्न हुई लेकिन इसके साथ ही वह गांव की पुरानी रौनक कहीं पीछे छुट गई.  आज भले ही स्थानीय चट्टी-बाजार बिजली के बल्ब औऱ रंगीन झालरों से अटे-सजे हैं. लाखों रुपये के बजट वाले मां दुर्गा के मंडप बने हैं. पश्चिम बंगाल से ढाक बजाने के लिए ढाकी बुलाये गये हैं. मेले लगे हैं. मेले में महिलाओं के सौंदर्य के लिए सामानों से लेकर बच्चों के खेल-खिलौने, भांति-भांति के देशी –विदेशी व्यंजनों के स्टॉल सजे हैं. झूले लगे हैं. लेकिन पारंपरिक भोजपुरिया व्यंजन के स्टॉल तो नदारद ही हैं. लिट्टी-चोखा और जलेबी के स्टॉल कहीं दिख तो जाएंगे लेकिन वह अपनी पारंपरिक फ्लेवर के बजाय पाश्चात्य शैली में परोसे जा रहे हैं. घी में चुपड़े लिट्टी को टिश्यूपेपर से पोछते लोग आसानी से दिख जा रहे हैं.  

कुछ प्रभावशाली और धनाढ्य लोग गरबा का आयोजन करते हैं... जिसमें कुलीन वर्गों का जमावड़ा ही दिखेगा. और यह माता रानी की श्रद्धा में आयोजित गरबा से अपने प्रभुत्व व संपन्नता के सामाजिक प्रदर्शन का जरिया अधिक लगता है. इस गरबा में सहभागिता से भोजपुरिया समाज के वंचित लोग अब भी वंचित ही है. दशहरा के दिन रावण का पुतला दहन की परंपरा ऐसा नहीं है कि बीते तीन दशक में ही आयात हुई है बल्कि इसकी परंपरा बहुत पुरानी है लेकिन पहले के बनिस्पत अब यह अधिक नाटकीय हो चला है.

कोरोना महामारी की वजह से सामाजिक दूरी बरते जाने से भले ही इस वर्ष पिछले वर्ष जैसी भीड़-भाड़ नहीं है. लेकिन इसी वक्त भोजपुरिया पट्टी का एक बड़ा हिस्सा बिहार के अंतर्गत आता है औऱ वहां विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यह नवरात्रि-दशहरा चुनाव प्रचार स्थल में तब्दील हो चुका है. असत्य पर सत्य की जीत के प्रतीक को सभी राजनीतिक दल अपने-अपने ढंग से व्याख्ति कर रावण का पुतला दहन की तैयारी में हैं. लोक इस लोकतंत्र के महालोक पर्व में इस हुड़दंग से स्वयं को अलग रख रहे हैं. अभी भी लोग माता रानी और भगवान श्रीराम से यही याचना व कामना कर रहे हैं कि जिसकी भी सरकार बने उसे ईश्वर सदबुद्धि दे कि लोगों को दो जुन की रोटी के लिए पलायन ना करना पड़े. कोरोना महामारी में यहां से गये और प्रवासी बने इन प्रवासियों को भारी कीमत चुकानी पड़ी है. नवरात्रि-दशहरा की चमक बढ़ी तो है लेकिन तीन-चार दशक पहले वाला गंवई उल्लास कहीं बिला गया है. सांस्कृतिक वैविद्यता व संपन्नता तो जनमानस में उत्कंठ है लेकिन इस पर्व के बहाने जो गंवई सौहार्द और प्रेम लोगों के हृदय में होता था, वह अब नदारद है. हे राम जी!हे देवी मइया! इस दुःखदायी महामारी से जग को मुक्ति दिलाये और पहले वाले सौहार्द और प्रेम की धारा गांव में प्रवाहित करें.

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