उत्तर 24 परगना में रंगकर्मी शुभंकर दासशर्मा पर हुआ हमला सिर्फ भीड़ की हिंसा का मामला नहीं है। यह एक गहरी बीमारी का लक्षण है: पहचान का राजनीतिकरण।
शुभंकर दासशर्मा को अपने धर्म के बारे में झूठ बोलने से इंकार करने के बाद पीटा गया। उन्होंने कहा, "हाँ, मैं एक मुस्लिम हूँ।" इस ईमानदारी की कीमत उन्हें लातों, घूंसों और बेहोशी के रूप में चुकानी पड़ी। हमले से ठीक पहले पूछा गया सवाल था— "मुस्लिम?" और उनके जवाब ने इस हमले पर मुहर लगा दी।
यह नया है और बेहद खतरनाक भी। दासशर्मा बताते हैं कि वाममोर्चे और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के शासनकाल के दौरान भी असहमति जताने के लिए उन पर इस तरह कभी हमला नहीं हुआ था। अब किसी व्यक्ति के कपड़े, नाम या उसका धर्म ही हिंसा को न्योता देने के लिए काफी है। वरवरा राव के नाटक ‘कीचड़’ (Kizad) का मंचन कर रहे एक थिएटर ग्रुप पर हमला होना इसमें एक और आयाम जोड़ता है: अब संस्कृति की भी पहरेदारी (पुलिसिंग) की जा रही है।
राज्य सरकार की अब तक की कार्रवाई महज प्रक्रियात्मक रही है—एक प्राथमिकी (FIR) और सीसीटीवी फुटेज की जाँच। लेकिन बड़ा सवाल अभी भी अनुत्तरित है: नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों पर अपनी पहचान बताने से डरने पर क्यों मजबूर किया जा रहा है?
भारत का संविधान धर्म और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। फिर भी ज़मीनी हकीकत यह है कि ये आज़ादियाँ सिमटती जा रही हैं। जब उपद्रवी (सतर्कतावादी) यह तय करने लगें कि "अपना" कौन है और "ग़ैर" कौन, तो लोकतंत्र महज़ एक वफ़ादारी परीक्षण बनकर रह जाता है।
दासशर्मा ने कहा कि वे काले, लाल, भगवा—"सभी रंग" पहनना जारी रखेंगे। यह एक चुनौती और प्रतिरोध है। लेकिन सुरक्षित रहने के लिए आम नागरिकों को इस तरह प्रतिरोधी (defiant) होने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। सरकार को नफरती अपराधों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करनी चाहिए, पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए और एक स्पष्ट संदेश देना चाहिए: बंगाल में, और पूरे भारत में, आपकी आस्था कोई अपराध नहीं है।
सुरक्षा का मतलब सिर्फ सीसीटीवी कैमरे लगाना नहीं है। इसका मतलब यह सुनिश्चित करना है कि एक मुस्लिम, एक हिंदू, एक बौद्ध या एक नास्तिक रात में बिना किसी डर के अपने घर पैदल जा सके। तब तक, "मुस्लिम? क्या इससे कोई फर्क पड़ता है?" जैसे सवालों के जवाब खून से ही दिए जाते रहेंगे।