डेरा सच्चा सौदा प्रमुख और यौन शोषण मामले में 20 साल की सजा काट रहे गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर रोहतक की सुनारिया जेल से 21 दिन की फरलो (अस्थायी रिहाई) मिल गई है। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच तड़के करीब 6:05 बजे वह जेल से बाहर निकला और सीधे सिरसा स्थित अपने आश्रम के लिए रवाना हो गया। वर्ष 2017 में दोषी ठहराए जाने के बाद से यह 17वां मौका है जब उसे पैरोल या फरलो के जरिए जेल से बाहर आने की राहत दी गई है।
यह रिहाई केवल एक कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने प्रशासनिक और न्यायिक गलियारों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। रोहतक की सुनारिया जेल में अपनी सजा काट रहे राम रहीम को महज दो महीने पहले ही 30 दिन की पैरोल अवधि पूरी करने के बाद वापस भेजा गया था। इतनी कम अवधि के भीतर बार-बार दी जाने वाली इस तरह की रिहाई पर कानून के विशेषज्ञों से लेकर विपक्षी नेताओं ने सवाल खड़े किए हैं और इसे 'राजनीतिक रियायत' करार दिया है।
इस बार-बार मिलने वाली छूट के पीछे 'हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टैम्परेरी रिलीज) एक्ट' के नियमों का हवाला दिया जाता है। इस कानून के तहत किसी भी पात्र कैदी को एक कैलेंडर वर्ष के भीतर निश्चित दिनों के लिए पैरोल और फरलो लेने का अधिकार प्राप्त होता है। हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि संगीन अपराधों (बलात्कार और हत्या) के मामलों में सजा काट रहे अपराधी को इतनी सहजता और बारंबारता से राहत मिलना आम नागरिकों के मन में न्याय प्रणाली के प्रति संशय पैदा करता है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो चुनाव या बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों के आसपास डेरा प्रमुख की रिहाई अक्सर चर्चा का विषय बनती रही है। हरियाणा, पंजाब और आसपास के राज्यों में डेरा सच्चा सौदा का एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है, जो कई निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजों को प्रभावित करने का माद्दा रखता है। यही कारण है कि विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते हैं कि राजनीतिक लाभ और चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए ही ऐसी रिहाइयों के समय का निर्धारण किया जाता है।
समग्र विश्लेषण करें तो यह घटनाक्रम भारत में कैदियों के पुनर्वास और रिहाई से जुड़े कानूनों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता की ओर इशारा करता है। जेल सुधार और कैदियों के अधिकारों के संरक्षण के बीच एक संतुलन होना आवश्यक है, ताकि गंभीर अपराधों के मामलों में न्याय की गरिमा प्रभावित न हो। लगातार मिलती फरलो से जहां एक ओर समर्थकों में खुशी का माहौल रहता है, वहीं दूसरी ओर यह मामला भारतीय न्यायिक सुधारों और कानून के समान प्रवर्तन के लिए एक यक्ष प्रश्न बनकर उभरा है।