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लद्दाख का संवैधानिक पुनर्गठन: अनुच्छेद 371(K) का प्रस्ताव और क्षेत्रीय मांगें

लद्दाख के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक मोड़ देखने को मिल रहा है। केंद्र सरकार ने इस केंद्र शासित प्रदेश की दीर्घकालिक मांगों और संवैधानिक चिंताओं को हल करने के लिए एक महत्वाकांक्षी प्रस्ताव तैयार किया है।

कल्ट करंट डेस्क
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11 Sep 2026
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लद्दाख के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक मोड़ देखने को मिल रहा है। केंद्र सरकार ने इस केंद्र शासित प्रदेश की दीर्घकालिक मांगों और संवैधानिक चिंताओं को हल करने के लिए एक महत्वाकांक्षी प्रस्ताव तैयार किया है। अगस्त 2019 में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के माध्यम से लद्दाख को बिना विधायिका वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। इसके बाद से ही स्थानीय आबादी, विशेष रूप से लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के बैनर तले, अपनी पहचान, संस्कृति, भूमि और रोजगार के अवसरों की सुरक्षा के लिए आंदोलनरत रही है। इस गतिरोध को खत्म करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संविधान के अनुच्छेद 371(K) के तहत लद्दाख के लिए विशेष कानूनी प्रावधानों का खाका प्रस्तुत किया है।

प्रस्तावित अनुच्छेद 371(K) का मुख्य उद्देश्य लद्दाख की नाजुक जनजातीय संस्कृति, पारिस्थितिकी और जनसांख्यिकी की रक्षा करना है। इसके तहत लद्दाख की भूमि के स्वामित्व और हस्तांतरण पर सख्त नियंत्रण का प्रावधान शामिल है, जिससे बाहरी लोगों द्वारा अनियंत्रित भूमि खरीद पर रोक लगाई जा सकेगी। इसके साथ ही, सरकारी नौकरियों में स्थानीय युवाओं के लिए 80% से अधिक आरक्षण और प्राथमिकता देने की बात कही गई है। यह व्यवस्था पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में लागू अनुच्छेद 371 के अन्य उप-खंडों के समान ही काम करेगी, जहाँ स्थानीय जनजातीय रीति-रिवाजों और प्रशासनिक स्वायत्तता को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। सरकार का तर्क है कि यह मॉडल क्षेत्र के विकास को रोके बिना स्थानीय आबादी के हितों की रक्षा करने का सबसे व्यवहारिक तरीका है।

हालाँकि, स्थानीय प्रतिनिधिमंडलों और राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रिया मिश्रित रही है। लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस ने सरकार की इस पहल का स्वागत तो किया है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनकी मूलभूत मांगें अभी भी पूरी नहीं हुई हैं। लद्दाख के आंदोलकारी नेताओं की चार मुख्य मांगें रही हैं: लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देना, इसे संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल करना, लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटों का सृजन करना, और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार की पूरी गारंटी। छठी अनुसूची के तहत मिलने वाली स्वायत्त जिला परिषदों (ADC) को विधायी और विधायी शक्तियां मिलती हैं, जबकि अनुच्छेद 371 केवल सुरक्षात्मक ढांचा प्रदान करता है।

इस अंतर को लेकर केंद्र सरकार और लद्दाख के नेताओं के बीच उच्चस्तरीय वार्ता का दौर जारी है। गृह मंत्रालय की अधिकार प्राप्त समिति ने आश्वस्त किया है कि लेह और कारगिल हिल डेवलपमेंट काउंसिल्स (LAHDC) को और अधिक वित्तीय व प्रशासनिक शक्तियां प्रदान की जाएंगी ताकि वे स्थानीय विकास के फैसले खुद ले सकें। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अनुच्छेद 371(K) का यह ढांचा स्थानीय जनभावनाओं को संतुष्ट कर पाता है या लद्दाख में एक नए राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत होती है। यह समझौता न केवल सीमावर्ती क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए जरूरी है, बल्कि भारत के रणनीतिक हितों के लिए भी अत्यंत संवेदनशील और आवश्यक है।