केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा घोषित 'स्वच्छ सर्वेक्षण 2026' के नतीजों में मध्य प्रदेश के इंदौर शहर ने एक बार फिर नया इतिहास रच दिया है। इंदौर को लगातार 8वीं बार भारत के सबसे स्वच्छ शहर के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसके साथ ही सूरत (गुजरात) ने दूसरा और नवी मुंबई (महाराष्ट्र) ने तीसरा स्थान हासिल किया है। इस सर्वेक्षण में देश भर के 4,000 से अधिक शहरों में कचरा प्रबंधन, जल संरक्षण, स्वच्छता सुविधाओं और जन-भागीदारी का व्यापक मूल्यांकन किया गया था।
इंदौर की इस अभूतपूर्व सफलता का मुख्य श्रेय वहां के '100% वेस्ट सेग्रिगेशन' (कचरा पृथक्करण) और उन्नत कचरा-प्रसंस्करण मॉडल को जाता है। शहर में गीला, सूखा, हानिकारक और इलेक्ट्रॉनिक कचरा घर-घर से ही अलग-अलग एकत्र किया जाता है। इसके अलावा, इंदौर नगर निगम ने 'जीरो-वेस्ट' नीतियां लागू की हैं, जिनके तहत शहर से निकलने वाले शत-प्रतिशत जैविक कचरे को बायो-सीएनजी और जैविक खाद में बदल दिया जाता है। इस कचरे से चलने वाली सिटी बसें इंदौर के सतत पर्यावरण मॉडल का एक बेहतरीन उदाहरण बन चुकी हैं।
इस सर्वेक्षण का एक और प्रमुख आकर्षण जन-भागीदारी (Public Participation) रहा। इंदौर के नागरिकों, सफाई मित्रों और नगर निगम प्रशासन के बीच का मजबूत तालमेल ही इस लगातार जीत की असली वजह है। शहर के व्यापारियों से लेकर छोटे बच्चों तक, स्वच्छता को एक दैनिक आदत के रूप में अपनाया गया है। इंदौर मॉडल को अब न केवल भारत के अन्य राज्य बल्कि कई विकसित देश भी अपने शहरों की स्वच्छता प्रणाली को सुधारने के लिए एक 'केस स्टडी' के रूप में अध्ययन कर रहे हैं।
राज्यवार रैंकिंग की बात करें तो मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र ने राज्यों की श्रेणी में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। इन राज्यों के कई छोटे शहरों ने भी स्वच्छता के मानकों पर अभूतपूर्व सुधार दिखाया है। केंद्र सरकार का मानना है कि इस प्रकार की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से देश के शहरी क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचा और रहने योग्य माहौल (Liveability Index) तेजी से बेहतर हो रहा है, जो प्रधानमंत्री के 'स्वच्छ भारत मिशन' के विजन को मजबूती प्रदान करता है।
अंततः, इंदौर की यह लगातार 8वीं जीत यह साबित करती है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जन-सहयोग एक साथ आ जाएं, तो किसी भी बड़े शहर की रूपरेखा को बदला जा सकता है। इंदौर ने देश के सामने यह मिसाल पेश की है कि स्वच्छता केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि एक टिकाऊ सांस्कृतिक मूल्य बन सकती है। यह उपलब्धि देश के अन्य महानगरों को भी अपने स्वच्छता मानकों को सुधारने की नई प्रेरणा देगी।