मणिपुर के मैतेई और कुकी बहुल सीमावर्ती क्षेत्रों में हाल ही में हुई हिंसक झड़प और गोलीबारी ने पूर्वोत्तर भारत की नाजुक सुरक्षा स्थिति को एक बार फिर रेखांकित किया है। एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में महिला सहित चार लोगों की जान जाने से स्थानीय निवासियों में भारी डर और असंतोष का माहौल है। घाटी और पहाड़ी इलाकों के मध्य स्थित बफर जोन्स (Buffer Zones) में उग्रवादी समूहों की बढ़ती आवाजाही और आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक अत्यंत गंभीर और जटिल चुनौती पेश कर रहा है।
पूर्वोत्तर का यह क्षेत्र भौगोलिक और सामाजिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है। म्यांमार से सटने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा के खुले होने के कारण अवैध घुसपैठ, नशीले पदार्थों की तस्करी (Drug Trafficking) और हथियारों की अवैध आपूर्ति की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। हालिया हिंसा में शामिल असामाजिक तत्वों और उग्रवादी गुटों को सीमा पार से मिलने वाले समर्थन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सुरक्षा बलों ने प्रभावित इलाकों में व्यापक कॉम्बिंग और सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है ताकि स्थिति को नियंत्रण में लाया जा सके।
इस सामाजिक विभाजन का सबसे दुखद पहलू आम नागरिकों का जीवन अस्त-व्यस्त होना है। पिछले कई महीनों से जारी अस्थिरता के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, कृषि और स्थानीय व्यापार पूरी तरह से ठप हो चुका है। हजारों लोग विस्थापित होकर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। हिंसक घटनाओं के बार-बार दोहराव से दोनों समुदायों के बीच अविश्वास की खाई और गहरी होती जा रही है, जिससे पुनर्वास और मानवीय सहायता के कार्यों में भारी बाधाएं आ रही हैं।
इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए केवल सैन्य या पुलिस बल का प्रयोग काफी नहीं है। इसके लिए एक बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें नागरिक समाज (Civil Society), दोनों समुदायों के सम्मानित बुजुर्गों और युवाओं को शामिल करके सीधे संवाद का माहौल तैयार किया जाए। इसके साथ ही, म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाने (Fencing) और 'फ्री मूवमेंट रिजीम' (FMR) पर कड़े नियंत्रण के प्रशासनिक फैसलों को जमीन पर तेजी से लागू करना होगा ताकि उग्रवादियों के सुरक्षित ठिकानों को खत्म किया जा सके।
मणिपुर में शांति केवल एक राज्य का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत की आंतरिक सुरक्षा और 'एक्ट ईस्ट' नीति की सफलता के लिए अनिवार्य शर्त है। केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी। कड़े सुरक्षा कदमों के साथ-साथ जब तक आजीविका के अवसरों का निर्माण और निष्पक्ष न्याय की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक इस खूबसूरत राज्य में स्थायी शांति की बहाली चुनौतीपूर्ण बनी रहेगी।