पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव और अस्थिरता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के बीच हुई मुलाकात बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत ने हमेशा से मध्य पूर्व में शांति और कूटनीतिक समाधान का समर्थन किया है, और यह वार्ता इसी दिशा में एक प्रभावी कदम के रूप में देखी जा रही है।
वार्ता का प्राथमिक केंद्र रेड सी (लाल सागर) में बढ़ते समुद्री सुरक्षा खतरों और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा पर रहा। इस क्षेत्र में होने वाली उथल-पुथल से भारत का वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति सीधे प्रभावित होती है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि हिंसा और संघर्ष किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकते, और सभी पक्षों को संयम तथा कूटनीति की राह अपनानी चाहिए।
चाबहार पोर्ट परियोजना (Chabahar Port) इस बैठक का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण बिंदु रही। भारत और ईरान ने इस सामरिक बंदरगाह के दीर्घकालिक प्रबंधन और कनेक्टिविटी को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई। चाबहार न केवल भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ने का मुख्य जरिया है, बल्कि यह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का भी एक अहम हिस्सा है।
ईरान और भारत के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं, जिसे इस बैठक में पुनर्जीवित किया गया। राष्ट्रपति पेजेशकियान ने भारत की निरपेक्ष और संतुलित विदेश नीति की सराहना की और आशा व्यक्त की कि भारत पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को रोकने के लिए अपनी वैश्विक साख का इस्तेमाल करते हुए एक मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।
संक्षेप में, यह द्विपक्षीय वार्ता भारत की 'थिंक वेस्ट' (Think West) नीति की सफलता को दर्शाती है। अरब देशों और इज़राइल के साथ मजबूत रिश्तों के साथ-साथ ईरान के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखना भारत की परिपक्व कूटनीति का प्रमाण है। यह बैठक यह दर्शाती है कि भारत वैश्विक शांति व्यवस्था स्थापित करने में कितना गंभीर है।