फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित यूनेस्को (UNESCO) की अंतर-सरकारी समिति के विशेष सत्र से भारत के लिए एक अत्यंत गर्वशाली और ऐतिहासिक खबर आई है। महाकुंभ और भारत की 'अखाड़ा व संत परंपरा' को मानव जाति की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) के रूप में पूर्ण सहमति से फिर से उच्चतम श्रेणी में सम्मानित किया गया है। विश्व निकाय ने स्वीकार किया है कि बिना किसी केंद्रीय निमंत्रण या विज्ञापन के करोड़ों लोगों का एक स्थान पर जुटना और पवित्र नदियों में स्नान करना, दुनिया का सबसे बड़ा और जीवंत सामाजिक-सांस्कृतिक चमत्कार है।
यूनेस्को के प्रतिनिधियों ने भारतीय महाकुंभ के दौरान अपनाए जाने वाले पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन, शून्य-अपशिष्ट (Zero-Waste) मॉडल और विभिन्न जातियों, वर्गों व संप्रदायों के बीच की समानता को देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने माना कि आधुनिक और डिजिटल युग में भी जहाँ समाज टूट रहा है, वहीं भारतीय संस्कृति का यह समागम पूरे विश्व को वसुधैव कुटुंबकम (पूरी दुनिया एक परिवार है) का पाठ पढ़ाता है।
इस अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारतीय संस्कृति के इस बहुआयामी रूप की प्रस्तुति ने दुनिया भर के नृविज्ञानियों (Anthropologists) और समाजशास्त्रियों का ध्यान खींचा है। यूरोपीय संघ के कई देशों ने घोषणा की है कि वे भारतीय सांस्कृतिक अध्ययन और दर्शन को अपने विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करेंगे ताकि वे समझ सकें कि कैसे लाखों-करोड़ों की भीड़ बिना किसी हिंसा या अराजकता के इतने बड़े उत्सव को अत्यंत अनुशासित तरीके से मनाती है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह अंतर्राष्ट्रीय मान्यता भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता की बहुत बड़ी विजय है। महाकुंभ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह भारतीय साहित्य, संगीत, आयुर्वेद, योग और दार्शनिक चिंतन का सबसे बड़ा खुला मंच है। भारत का 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) दुनिया भर में किस कदर मजबूत हो रहा है, यह यूनेस्को का यह फैसला साफ तौर पर बयां करता है।
आर्थिक और पर्यटन की दृष्टि से इस मान्यता से भारत के 'सांस्कृतिक पर्यटन' (Cultural Tourism) को अभूतपूर्व उछाल मिलने जा रहा है। दुनिया भर से लाखों विदेशी शोधार्थी, पर्यटक और आध्यात्मिक जिज्ञासु अब भारत की ओर रुख कर रहे हैं। इससे भारत के हस्तशिल्प, स्थानीय कारीगरों, परिवहन और आतिथ्य उद्योग (Hospitality Industry) को अरबों रुपये का सीधा फायदा होगा, जिससे ग्रामीण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को अत्यधिक मजबूती मिलेगी।
यह घटनाक्रम यह साबित करता है कि भारतीय संस्कृति कोई निर्जीव अवशेष नहीं है, बल्कि एक बहती हुई अमर धारा है जो सदियों बाद भी उतनी ही प्रासंगिक और ऊर्जावान है। यूनेस्को का यह सम्मान हर एक भारतीय के लिए गौरव का क्षण है, जो विश्व पटल पर भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर का डंका बजा रहा है।
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