उत्तरी अफ़्रीका के प्रमुख तेल उत्पादक देश लीबिया से एक बेहद सनसनीखेज खबर आ रही है, जहाँ वहाँ के सबसे बड़े तेल क्षेत्र 'शराफ' (Sharara Oilfield) पर एक नए और भारी हथियारों से लैस सशस्त्र विद्रोही गुट ने पूरी तरह से नाकेबंदी कर दी है। इस अचानक हुए हमले और कब्जे के बाद लीबिया का दैनिक तेल उत्पादन पलक झपकते ही 3 लाख बैरल से अधिक गिर गया है। राष्ट्रीय तेल निगम (NOC) ने मजबूरी में 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) की घोषणा कर दी है, जिससे यूरोपीय बाजारों में कच्चे तेल की सप्लाई तुरंत प्रभाव से ठप हो गई है।
लीबिया लंबे समय से दो प्रतिद्वंद्वी सरकारों—त्रिपोली की पश्चिमी सरकार और बेनगाजी की पूर्वी सैन्य सरकार—के बीच बंटा हुआ है। इस नए सशस्त्र गुट ने मांग रखी है कि तेल राजस्व का न्यायसंगत वितरण किया जाए और केंद्रीय बैंक के प्रमुख को तुरंत पद से हटाया जाए। इस नाकेबंदी की वजह से भूमध्य सागर के तटीय बंदरगाहों पर तेल टैंकरों की लंबी कतारें लग गई हैं और वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड के दामों में फिर से अप्रत्याशित उछाल देखा जा रहा है।
यूरोपीय संघ के देशों के लिए लीबियाई तेल आपूर्ति का रुकना किसी भयावह सपने से कम नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से यूरोप अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए उत्तरी अफ़्रीकी देशों पर अत्यधिक निर्भर हो गया था। सर्दियों का मौसम सिर पर होने के कारण इटली, फ्रांस और स्पेन में गैस और तेल की किल्लत की आशंका बढ़ गई है। यूरोपीय नेताओं ने लीबियाई गुटों से तुरंत तेल उत्पादन बहाल करने की गुहार लगाई है, लेकिन विद्रोही अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में लीबिया का यह तेल संकट भारत के लिए एक मिली-जुली चुनौती और अवसर लेकर आया है। एक तरफ जहां कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी से भारत का तेल आयात बिल बढ़ेगा और देश में महंगाई का दबाव बन सकता है, वहीं दूसरी तरफ यह भारत की रिफाइनिंग कंपनियों के लिए नए अवसर भी पैदा कर सकता है। वैश्विक बाजार में तेल की किल्लत होने पर यूरोपीय देश एक बार फिर भारत से प्रोसेस्ड फ्यूल खरीदने के लिए मजबूर होंगे।
भारत की ऊर्जा रणनीति हमेशा से अपने आयात स्रोतों को विविधतापूर्ण (Diversify) बनाने की रही है। भारत ने खाड़ी देशों, रूस और अमेरिका के अलावा अफ़्रीकी देशों से भी तेल लेना शुरू किया था। लीबिया जैसे अस्थिर देशों में बार-बार होने वाले इस तरह के संकट यह साबित करते हैं कि भारत का रूस से लगातार सस्ता क्रूड खरीदने का फैसला पूरी तरह से राष्ट्रहित में था और कितना सही था।
लीबिया की यह घटना दिखाती है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक छोटी सी नाकेबंदी भी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला सकती है। भारत को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) को पूरी क्षमता से भरकर रखना होगा ताकि इस तरह के अचानक आने वाले वैश्विक झटकों से घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर कोई आंच न आए।
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