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डॉलर ध्वस्त, ब्रिक्स का धमाका!

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मंच पर इस समय एक खामोश लेकिन बेहद खतरनाक क्रांति आकार ले रही है। ब्रिक्स (BRICS) संगठन के विस्तार और वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर के बढ़ते वर्चस्व को खत्म करने के प्रयासों ने पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की नींद उड़ा दी है

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
08 Oct 2026

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मंच पर इस समय एक खामोश लेकिन बेहद खतरनाक क्रांति आकार ले रही है। ब्रिक्स (BRICS) संगठन के विस्तार और वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर के बढ़ते वर्चस्व को खत्म करने के प्रयासों ने पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की नींद उड़ा दी है। दुनिया के कई देश अब डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में द्विपक्षीय व्यापार करने के समझौते तेजी से कर रहे हैं। अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों पर लगाए जाने वाले आर्थिक प्रतिबंधों और डॉलर को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने के रवैये ने बाकी दुनिया को एक वैकल्पिक वित्तीय प्रणाली बनाने के लिए मजबूर कर दिया है।

ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ-साथ अब नए सदस्य देशों के जुड़ने से ब्रिक्स की ताकत में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है। यह गुट अब दुनिया की आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। ब्रिक्स देश अपनी एक नई साझा डिजिटल मुद्रा या एक वैकल्पिक सीमा पार भुगतान प्रणाली (Alternative Payment System) पर काम कर रहे हैं, जो SWIFT सिस्टम को सीधी चुनौती देगी। यदि यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहता है, तो वैश्विक वित्तीय बाजार में दशकों से चला आ रहा पश्चिमी देशों का एकछत्र राज और वर्चस्व हमेशा के लिए समाप्त हो सकता है।

भारत के लिए यह डी-डॉलराइजेशन (De-Dollarization) की लहर एक बड़ा अवसर और चुनौतीपूर्ण संतुलन दोनों लेकर आई है। भारत ने पहले ही अपने भारतीय रुपये (INR) को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार योग्य बनाने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), रूस और कई अन्य मित्र देशों के साथ भारत ने रुपये और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार शुरू कर दिया है। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हुआ है और डॉलर के मुकाबले रुपये में होने वाले उतार-चढ़ाव से भारतीय व्यापार को सुरक्षा मिली है।

हालांकि, भारत का रुख इस मामले में चीन और रूस से थोड़ा अलग और बेहद सधा हुआ है। चीन जहां डॉलर को पूरी तरह खत्म करके अपनी मुद्रा युआन (Yuan) का दबदबा स्थापित करना चाहता है, वहीं भारत किसी एक देश के आधिपत्य के खिलाफ है। भारत 'एंटी-वेस्ट' (पश्चिम विरोधी) नहीं, बल्कि 'नॉन-वेस्ट' (गैर-पश्चिमी) दृष्टिकोण में विश्वास रखता है। भारत चाहता है कि एक ऐसी बहुध्रुवीय (Multipolar) वित्तीय व्यवस्था बने, जहां सभी विकासशील देशों को समान अधिकार मिले और किसी एक महाशक्ति की मनमानी न चल सके।

इस नए आर्थिक समीकरण से भारत की वैश्विक साख में भारी इजाफा हुआ है। भारत को वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज के रूप में देखा जा रहा है। भारत अपनी मजबूत डिजिटल भुगतान प्रणाली जैसे UPI को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाकर दुनिया को एक सस्ता, सुरक्षित और पारदर्शी विकल्प प्रदान कर रहा है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर एक नई मजबूती मिल रही है और भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनी शर्तें रख पा रहा है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में हो रहा यह बड़ा बदलाव आने वाले दशकों की दिशा तय करेगा। डॉलर का घटता दबदबा और ब्रिक्स का बढ़ता प्रभाव यह स्पष्ट संकेत दे रहा है कि शक्ति का केंद्र अब पश्चिम से पूर्व की ओर स्थानांतरित हो रहा है। भारत इस ऐतिहासिक बदलाव के केंद्र में है और अपनी सूझबूझ से एक नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का नेतृत्व करने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है।

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