दक्षिण अमेरिका के चिली में स्थित दुनिया के सबसे बड़े लिथियम भंडार 'अटाकामा साल्ट फ्लैट' को लेकर एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक निर्णय सामने आया है। चिली की सरकार ने राष्ट्रीय संसाधन नीति के तहत अटाकामा बेसिन में काम कर रही कई विदेशी निजी खनन कंपनियों के नए लीज लाइसेंस को तत्काल प्रभाव से रोक दिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में सभी लिथियम खदानों का नियंत्रण राज्य द्वारा संचालित नई राष्ट्रीय लिथियम कंपनी के पास रहेगा और विदेशी कंपनियों को केवल अल्पसंख्यक हिस्सेदारी ही दी जाएगी।
इस सरकारी फैसले ने पूरी दुनिया की ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री को हिलाकर रख दिया है। चिली दुनिया के कुल लिथियम उत्पादन का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा अकेला सप्लाई करता है, और इसके पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित लिथियम भंडार है। लिथियम को 'सफेद सोना' (White Gold) कहा जाता है क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरियों को बनाने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल है। चिली के इस कड़े कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में बैटरी-ग्रेड लिथियम कार्बोनेट के दाम में 11 प्रतिशत का अचानक उछाल दर्ज किया गया है।
अमेरिकी, यूरोपीय और एशियाई टेक दिग्गज कंपनियां इस फैसले से बेहद असहज हैं, क्योंकि उनके अरबों डॉलर के निवेश अब सरकारी नियंत्रण के अधीन आ जाएंगे। चिली सरकार का तर्क है कि वह अपने देश के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग केवल विदेशी कंपनियों के लाभ के लिए नहीं होने देगी, बल्कि स्थानीय समुदायों के विकास और मूल्य संवर्धन के लिए इस खनिज का राष्ट्रीयकरण जरूरी था।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह निर्णय भारत की इलेक्ट्रिक वाहन (EV) क्रांति और हरित ऊर्जा लक्ष्यों के लिए एक बड़ा झटका है। भारत अपनी लिथियम जरूरतों के लिए 100 प्रतिशत आयात पर निर्भर है। भारत सरकार की संयुक्त उद्यम कंपनी 'खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड' (KABIL) अर्जेंटीना और चिली जैसे दक्षिण अमेरिकी देशों में लिथियम खदानों में हिस्सेदारी हासिल करने की कोशिश कर रही थी। चिली द्वारा विदेशी नियंत्रण को सीमित करने से भारतीय कंपनियों की पहुंच मुश्किल हो जाएगी।
यदि वैश्विक बाजार में लिथियम के दाम बढ़ते हैं, तो भारत में टाटा, महिंद्रा, ओला जैसी कंपनियों द्वारा बनाई जाने वाली इलेक्ट्रिक कारों और दोपहिया वाहनों की कीमतें 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर भारत के उस राष्ट्रीय लक्ष्य पर पड़ेगा, जिसके तहत 2030 तक 30 प्रतिशत निजी वाहनों को इलेक्ट्रिक करने की योजना बनाई गई है। बैटरियों के महंगे होने से आम भारतीय उपभोक्ता के लिए इलेक्ट्रिक वाहन खरीदना बजट से बाहर हो सकता है।
इस बड़े घटनाक्रम का ठोस टेकअवे यह है कि भारत केवल विदेशी लिथियम आयात के भरोसे अपनी ईवी क्रांति को सफल नहीं बना सकता। भारत को जम्मू-कश्मीर और राजस्थान में पाए गए घरेलू लिथियम भंडारों के व्यावसायिक निष्कर्षण में गति लानी होगी। इसके साथ ही, भारतीय वैज्ञानिकों और उद्योग जगत को लिथियम के विकल्पों—जैसे सोडियम-आयन और एल्युमिनियम-एयर बैटरी तकनीकों—के अनुसंधान और निर्माण पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि भविष्य में किसी विदेशी देश के खनिज नीति परिवर्तन से भारत की प्रगति न रुके।
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