अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में लंबे समय से जारी अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए एक और बड़ा रणनीतिक कदम उठाया गया है। ब्रिक्स (BRICS) समूह के सदस्य देशों ने अपनी अंतर-व्यापारिक भुगतान प्रणाली के पायलट प्रोजेक्ट को गति देने पर सहमति जताई है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों और डॉलर के राजनीतिकरण से बचने के लिए शुरू की गई यह पहल अब एक वास्तविक वैश्विक वित्तीय विकल्प बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
इस नई प्रणाली के तहत सदस्य देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं और एक डिजिटल टोकन-आधारित निपटान तंत्र के जरिए सीधे व्यापार कर सकेंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता काफी हद तक घट जाएगी। इस कदम को वैश्विक बैंक सिस्टम (SWIFT) के समानांतर एक नई व्यवस्था खड़ी करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जिससे पश्चिमी देशों की आर्थिक नीतियों का दुनिया पर प्रभाव सीमित हो सके।
भारत के लिए यह निर्णय एक संतुलित लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक मोड़ है। भारत लंबे समय से अपनी मुद्रा 'रुपये' में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने की नीति पर काम कर रहा है। रूस और यूएई जैसे देशों के साथ भारत ने पहले ही स्थानीय मुद्राओं में तेल और वस्तुओं की खरीदारी शुरू कर दी है। ब्रिक्स की इस नई पहल से भारत को डॉलर के उतार-चढ़ाव और विदेशी मुद्रा भंडार के दबाव से मुक्ति मिल सकती है।
हालांकि, भारत का दृष्टिकोण चीन या रूस से थोड़ा अलग है। भारत 'डी-डॉलराइजेशन' (डॉलर खत्म करने) के नाम पर चीन की मुद्रा 'युआन' के प्रभुत्व को स्वीकार करने के बिल्कुल पक्ष में नहीं है। नई दिल्ली का स्पष्ट रुख है कि कोई भी नई वित्तीय प्रणाली निष्पक्ष, पारदर्शी और बहुध्रुवीय होनी चाहिए, न कि केवल डॉलर की जगह किसी अन्य देश की मुद्रा का एकाधिकार स्थापित करने वाली।
भारत की इस रणनीति से देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को बड़ा लाभ हो सकता है, क्योंकि उन्हें डॉलर-रुपये की विनिमय दर में होने वाले अचानक नुकसान से सुरक्षा मिलेगी। वैश्विक स्तर पर देखें तो इस बदलाव से उन विकासशील देशों को बड़ी राहत मिलेगी जो अक्सर डॉलर की कमी और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों में बदलाव के कारण आर्थिक संकट का सामना करते हैं।
विश्व अर्थव्यवस्था अब औपचारिक रूप से दो वित्तीय धड़ों में बंटती दिख रही है। एक तरफ जहां पश्चिमी देश पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था और डॉलर के जरिए अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपना स्वतंत्र रास्ता चुन रही हैं। इस वित्तीय युद्ध में भारत की भूमिका एक प्रमुख संतुलनकर्ता की है जो वैश्विक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में निर्णायक होगी।
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