मिडिल ईस्ट के संघर्ष की आग अब केवल थल तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने हिंद महासागर के मुहाने पर दस्तक दे दी है। अरब सागर के एक प्रमुख समुद्री व्यापार मार्ग पर अचानक उस समय भारी तनाव पैदा हो गया, जब अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में गश्त कर रहे एक बड़े तेल टैंकर के पास रहस्यमयी ड्रोन हमला देखा गया। पश्चिमी देशों के खुफिया तंत्र का मानना है कि इस इलाके में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा अब इतिहास के सबसे कठिन दौर में पहुंच चुकी है।
इस हमले के तुरंत बाद अमेरिका और ब्रिटेन की नौसेनाओं ने रेड सी और अरब सागर में अपनी तैनाती बढ़ा दी है। जहाजों के लिए लाल सागर का रास्ता पहले से ही जोखिम भरा बना हुआ था, लेकिन अब इस नए क्षेत्र में हुई घटना ने वैश्विक व्यापार को फिर से झटका दिया है। तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों के बीमा प्रीमियम में रातों-रात बेतहाशा वृद्धि हो गई है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के पूरी तरह ठप पड़ने का खतरा मंडराने लगा है।
भारत के लिए यह घटना सीधे तौर पर बेहद चिंताजनक है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी व्यापारिक मार्ग के जरिए पूरा करता है। मुंबई और गुजरात के बंदरगाहों पर आने वाले तेल टैंकरों का मार्ग यही क्षेत्र है। अगर इस समुद्री रास्ते पर अस्थिरता और बढ़ती है, तो भारत में कच्चे तेल के आयात पर सीधा असर पड़ेगा, जिससे देश के भीतर पेट्रोल और डीजल के दामों में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।
व्यापारिक दृष्टिकोण से देखें तो भारतीय निर्यातकों के लिए शिपिंग लागत (फ्रेट रेट्स) में फिर से बड़ा इजाफा होगा। भारतीय कपड़ा, कृषि और आईटी हार्डवेयर उत्पाद जो यूरोप और अमेरिका भेजे जाते हैं, उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर इसका असर पड़ेगा। जहाजों को स्वेज़ नहर के बजाय पूरे अफ्रीका का चक्कर लगाकर (केप ऑफ गुड होप के रास्ते) जाना पड़ सकता है, जिससे यात्रा में 12 से 15 दिनों का अतिरिक्त समय लगेगा।
रणनीतिक रूप से, भारतीय नौसेना ने इस स्थिति को भांपते हुए अपने युद्धपोतों को उत्तरी और अरब सागर के प्रमुख जलमार्गों पर मुस्तैद कर दिया है। 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' के रूप में भारत अब केवल अपने जहाजों ही नहीं, बल्कि इस क्षेत्र से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों को भी एस्कॉर्ट सेवा प्रदान कर रहा है। हिंद महासागर में भारत का बढ़ता नौसैनिक दबाव इस बात का संकेत है कि देश किसी भी नौसैनिक संकट से निपटने के लिए तत्पर है।
वैश्विक स्तर पर यह तनाव ऊर्जा युद्ध में बदलता दिख रहा है। यदि आने वाले दिनों में दोनों पक्षों की ओर से सैन्य बयानबाजी और बढ़ी, तो यह केवल मिडिल ईस्ट या पश्चिमी एशिया का संकट नहीं रहेगा, बल्कि दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्थाओं को भी झकझोर देगा। भारतीय कूटनीति के लिए अब चुनौती यह है कि वह तेल आपूर्ति बनाए रखते हुए क्षेत्रीय शांति के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल कैसे करती है।
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