काला सागर के अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक बार फिर बारूद की गंध फैल गई है। ओडेसा बंदरगाह से मिश्रित खाद्यान्न लेकर मिस्र की ओर बढ़ रहे एक असैन्य मालवाहक जहाज पर रातों-रात गाइडेड मिसाइल से हमला किया गया है। बंदरगाह अधिकारियों और समुद्री सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, इस हमले के बाद जहाज के मुख्य केबिन में भीषण आग लग गई और अनाज का एक बड़ा हिस्सा पानी में बह गया। इस घटना के बाद काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को अस्थायी रूप से रोक दिया गया है।
इस आकस्मिक हमले ने पूरे वैश्विक कृषि बाजार में खलबली मचा दी है। अंतरराष्ट्रीय गेहूं और मक्का वायदा बाजार में कुछ ही घंटों के भीतर 7.5 प्रतिशत की भारी तेजी देखी गई। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य सुरक्षा प्रकोष्ठ के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, यदि इस समुद्री मार्ग से अनाज का निर्यात दो हफ्ते भी बाधित रहता है, तो उत्तर अफ्रीका और मध्य पूर्व के देशों में आटा और ब्रेड के दाम 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ जाएंगे। बीमा कंपनियों ने इस पूरे कॉरिडोर में जहाजों के लिए अतिरिक्त जोखिम बीमा प्रीमियम को चार गुना कर दिया है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला केवल एक जहाज को नुकसान पहुंचाने के इरादे से नहीं किया गया था। इसका असली मकसद समुद्री गलियारे में डर का माहौल पैदा करना और प्रतिद्वंद्वी देशों के आर्थिक संसाधनों को चोट पहुंचाना है। तटीय क्षेत्रों में नौसैनिक गश्त बढ़ा दी गई है, लेकिन वाणिज्यिक जहाजों के कप्तान इस मार्ग पर आगे बढ़ने से साफ इनकार कर रहे हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भू-राजनीतिक तनाव अब सीधे आम इंसान की थाली पर वार कर रहे हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखें तो यह घटना हमारी खाद्य तेल और उर्वरक सुरक्षा पर सीधा हमला है। भारत अपनी कुल सूरजमुखी तेल जरूरतों का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा इसी काला सागर क्षेत्र से आयात करता है। इसके अलावा, भारत की रबी फसल के लिए आवश्यक पोटाश और नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की खेप भी इसी जलमार्ग से आती है। व्यापारिक जहाजों के रुकने से भारतीय बंदरगाहों पर खाद्य तेल की आवक प्रभावित होगी, जिससे घरेलू बाजार में सूरजमुखी और सोयाबीन तेल के दाम 12 से 15 रुपये प्रति लीटर तक चढ़ सकते हैं।
भारत सरकार और निजी आयातकों के लिए यह स्थिति सतर्क होने की चेतावनी है। भारत के पास फिलहाल 45 से 50 दिनों का खाद्य तेल भंडार मौजूद है, लेकिन यदि काला सागर में यह गतिरोध लंबा खिंचता है, तो भारत को तुरंत ब्राजील, अर्जेंटीना और मलेशिया जैसे वैकल्पिक बाजारों की ओर रुख करना होगा। इसके साथ ही, उर्वरक आयात में संभावित देरी से बचने के लिए केंद्र सरकार को घरेलू कंपनियों को बफर स्टॉक जारी करने के निर्देश देने होंगे ताकि किसानों को आगामी बुवाई सत्र में किसी तरह की किल्लत का सामना न करना पड़े।
ठोस कूटनीतिक विश्लेषण यह बताता है कि भारत को अब केवल एक समुद्री मार्ग या एक विशिष्ट क्षेत्र पर अपनी निर्भरता खत्म करनी होगी। भारत को लैटिन अमेरिकी देशों के साथ दीर्घकालिक कृषि-व्यापार समझौते तुरंत करने चाहिए। वैश्विक अनिश्चितता के इस दौर में भारत की अपनी घरेलू उत्पादन क्षमता और बहु-स्तरीय आपूर्ति प्रणाली ही देश को किसी भी अंतरराष्ट्रीय खाद्य संकट से सुरक्षित रख सकती है।
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