अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपनी ताजा वैश्विक आर्थिक आउटलुक रिपोर्ट जारी करते हुए दुनिया को दीर्घकालिक आर्थिक सुस्ती और मंदी के प्रति आगाह किया है। आईएमएफ के अनुसार, भू-राजनीतिक संघर्षों, होर्मुज और काला सागर में जारी तनाव और कर्ज के भारी बोझ के कारण वैश्विक विकास दर 2026 और 2027 में बेहद धीमी गति से आगे बढ़ेगी।
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि हालांकि एआई में भारी निवेश ने वैश्विक वृद्धि को कुछ हद तक सहारा दिया है, लेकिन लगातार बने ऊर्जा संकट और महंगे ईंधन से दुनिया भर में केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरें घटाना मुश्किल हो गया है। इस कारण विकासशील और विकसित दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं पर मंदी की तलवार लटक रही है।
विश्व बैंक ने भी चेतावनी दी है कि उर्वरक (फर्टिलाइजर) की बढ़ती कीमतें और खाद्य पदार्थों की कमी से दुनिया के कई देशों में मुद्रास्फीति (महंगाई) एक बार फिर नियंत्रण से बाहर हो सकती है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आ रही रुकावटों ने निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।
इस निराशाजनक वैश्विक परिदृश्य में केवल एशियाई क्षेत्र को एकमात्र उम्मीद की किरण माना जा रहा है। वैश्विक विकास में अधिकांश योगदान एशियाई देशों से आने की उम्मीद है, लेकिन महाशक्तियों के बीच बढ़ते ट्रेड-वॉर और टैरिफ युद्ध से इस विकास दर के भी प्रभावित होने की पूरी आशंका बनी हुई है।
भारत के परिप्रेक्ष्य में यह रिपोर्ट राहत और चुनौती दोनों पेश करती है। आईएमएफ और प्रमुख वैश्विक एजेंसियों के अनुसार, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारत 7% के आसपास की विकास दर के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।
हालांकि, अगर वैश्विक मंदी गहराती है और अंतरराष्ट्रीय मांग घटती है, तो भारत के निर्यात (Exports) पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। भारत सरकार घरेलू मांग, बुनियादी ढांचे (Infrastructure) में निवेश और मेक इन इंडिया अभियानों को मजबूत करके देश की अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से सुरक्षित रखने के रणनीतिक प्रयासों में जुटी हुई है।
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