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अफ़्रीकी 'क्रिटिकल मिनरल्स' युद्ध

अफ़्रीकी महाद्वीप के मध्य में स्थित लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो (DR Congo) और समृद्ध खनिज क्षेत्रों में महाशक्तियों का 'रिसोर्स वॉर' (Resource War) अब एक भीषण खूनी संघर्ष का रूप ले चुका है। लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मिनरल्स (Rare Earth Minerals) के विशाल भंडारों पर कब्जे को लेकर रूस के अर्धसैनिक बल

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
14 Oct 2026
Solar farm during sunset

अफ़्रीकी महाद्वीप के मध्य में स्थित लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो (DR Congo) और समृद्ध खनिज क्षेत्रों में महाशक्तियों का 'रिसोर्स वॉर' (Resource War) अब एक भीषण खूनी संघर्ष का रूप ले चुका है। लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मिनरल्स (Rare Earth Minerals) के विशाल भंडारों पर कब्जे को लेकर रूस के अर्धसैनिक बल (पूर्व में वैगनर ग्रुप) और पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित निजी सुरक्षा एजेंसियों के बीच सीधी खूनी मुठभेड़ हुई है। इस हिंसक टकराव में दर्जनों विदेशी लड़ाकों और स्थानीय सैनिकों की मौत हो गई है।  

यह जंग केवल अफ्रीका के आंतरिक संसाधनों की नहीं, बल्कि भविष्य की 'ग्रीन एनर्जी' और 'एआई क्रांति' पर कब्जे की जंग है। इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरियां, स्मार्टफोन, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम और एआई सुपरकंप्यूटर पूरी तरह से कांगो और अफ़्रीकी महाद्वीप के कोबाल्ट और लिथियम पर निर्भर हैं।

रूस और चीन ने पिछले कुछ वर्षों में अफ़्रीकी देशों में अपना प्रभाव तेजी से बढ़ाया है, जिससे अमेरिका और यूरोपीय देश बेहद बौखलाए हुए हैं। कांगो के खनिज-समृद्ध पूर्वी इलाकों में छिड़े इस गृहयुद्ध और विदेशी दखल ने लाखों स्थानीय नागरिकों को बेघर कर दिया है और दुनिया की प्रमुख टेक कंपनियों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं।  

भारतीय परिपेक्ष्य में अफ़्रीकी महाद्वीप में बढ़ता यह जियोपोलिटिकल तनाव भारत की हरित ऊर्जा (Green Energy) और ईवी-क्रांति की योजनाओं के लिए बहुत बड़ा झटका है। भारत 2030 तक अपनी सस्टेनेबल एनर्जी और इलेक्ट्रिक वाहन नीति को तेजी से आगे बढ़ा रहा है, जिसके लिए भारत को लिथियम और कोबाल्ट के स्थिर और सस्ते आयात की आवश्यकता है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर द्वारा हाल ही में किए गए अफ़्रीकी देशों के दौरों का मुख्य उद्देश्य भारत के लिए इन क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति को सुरक्षित करना ही था। यदि अफ़्रीका में महाशक्तियों की यह खूनी जंग नहीं थमी, तो भारत का 'क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन' भारी रूप से प्रभावित हो सकता है।  

अफ़्रीका एक बार फिर 19वीं सदी के औपनिवेशिक शोषण की तरह 21वीं सदी में महाशक्तियों का 'खनिज शिकारगाह' बनता जा रहा है। तकनीक की इस अंधी दौड़ में अफ़्रीका के निर्दोष नागरिकों की बलि चढ़ाई जा रही है।

अगर इस खनिज-युद्ध का समाधान कूटनीति से नहीं निकाला गया, तो आने वाले समय में विश्व अर्थव्यवस्था को हरित ऊर्जा नहीं, बल्कि एक नए प्रकार के वैश्विक महा-संकट का सामना करना पड़ेगा।

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