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आईएमएफ का बड़ा अनुमान

भारतीय अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर इस समय दो बेहद विपरीत और चौंकाने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि दर (GDP Growth) के अनुमान को बढ़ाकर सीधे 7 प्रतिशत कर दिया है

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
14 Oct 2026
Solar farm during sunset

भारतीय अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर इस समय दो बेहद विपरीत और चौंकाने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि दर (GDP Growth) के अनुमान को बढ़ाकर सीधे 7 प्रतिशत कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू स्तर पर बढ़ती खुदरा महंगाई (Retail Inflation) ने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 5.54 प्रतिशत पर पहुँच गई है, जो पिछले महीनों के मुकाबले काफी अधिक है। खाने-पीने की चीजों की कीमतों में अचानक आए भारी उछाल ने शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के उपभोक्ताओं को गहरी चिंता में डाल दिया है।  

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस ताजा महंगाई के पीछे सबसे बड़ा हाथ खाद्य पदार्थों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि का है, जहाँ ग्रामीण इलाकों में खाद्य महंगाई दर बढ़कर 8.06 प्रतिशत तक दर्ज की गई है। विशेष रूप से रसोई की मुख्य जरूरत माने जाने वाले प्याज की सालाना महंगाई दर बढ़कर 100 प्रतिशत से भी अधिक (लगभग 108.09%) हो गई है। इसके अलावा अदरक, लहसुन, नींबू और कुछ चुनिंदा हरी सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे आम मध्यमवर्गीय परिवार की थाली पर सीधा असर पड़ा है। खाने-पीने के सामान के अलावा रेस्टोरेंट, होटल सेवाओं और पर्सनल केयर उत्पादों की कीमतों में भी 9 से 13 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।  

देश के विभिन्न राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु, ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में खुदरा महंगाई दर राष्ट्रीय औसत से भी ऊपर, यानी 6 प्रतिशत के पार बनी हुई है। हालांकि, दिल्ली जैसे कुछ चुनिंदा महानगरों में यह दर अपेक्षाकृत कम (लगभग 3.40%) दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि असंतुलित मौसम और सप्लाई चेन में आई रुकावटों के कारण यह दबाव पैदा हुआ है, जिससे रिजर्व बैंक (RBI) के नीतिगत निर्णयों पर भी दबाव बढ़ सकता है। सरकार और केंद्रीय बैंक लगातार इन आंकड़ों पर नजर बनाए हुए हैं ताकि आपूर्ति को नियंत्रित कर कीमतों को काबू में किया जा सके।  

दूसरी ओर, इन घरेलू चुनौतियों के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपनी ताजा 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत आंतरिक ताकत पर मुहर लगाई है। IMF ने 2026 और 2027 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान जुलाई के 6.4% से बढ़ाकर सीधे 7% कर दिया है। वैश्विक स्तर पर सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्थाओं और महंगे कच्चे तेल के संकट के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से उभरती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे आगे बना हुआ है। IMF ने इस तेजी के पीछे मजबूत घरेलू खपत, सर्विस सेक्टर का शानदार प्रदर्शन और देश की अनुकूल जनसांख्यिकी (Demographics) को मुख्य वजह बताया है।  

संयुक्त राष्ट्र की एक अन्य एजेंसी UNCTAD ने भी घरेलू मांग और विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र के दम पर भारत की विकास दर 7.3% तक पहुँचने की संभावना जताई है। हालांकि, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भले ही मैक्रोइकोनॉमिक आंकड़े (Macroeconomic Indicators) और जीडीपी की रफ्तार देश की मजबूती को दर्शाती हो, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर आम आदमी को बढ़ती महंगाई और खाद्य संकट से राहत नहीं मिलती, तब तक समावेशी विकास की तस्वीर अधूरी ही मानी जाएगी। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती विकास की इस तेज रफ्तार को बनाए रखते हुए खुदरा महंगाई को नियंत्रित करने की है।  

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