संयुक्त राज्य अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) पर कड़े आर्थिक और राजनयिक प्रतिबंधों की घोषणा करके वैश्विक न्याय प्रणाली में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। वाशिंगटन का यह फैसला आईसीसी के अभियोजकों द्वारा अमेरिकी सहयोगियों और सैन्य कर्मियों के खिलाफ की जा रही जांच के जवाब में आया है।
अमेरिकी प्रशासन के इस फैसले के तहत न केवल आईसीसी के जजों और वकीलों पर प्रतिबंध लगाए जाएंगे, बल्कि कोर्ट को अपनी सेवाएँ या तकनीक देने वाली निजी कंपनियों पर भी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इस कदम से अंतरराष्ट्रीय कानूनी संस्थाओं के कामकाज पर गंभीर अनिश्चितता छा गई है।
यूरोपीय संघ और कई मानवाधिकार संगठनों ने अमेरिका के इस कदम की आलोचना की है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों व संस्थानों की साख पर बड़ा हमला करार दिया है। ब्रसेल्स ने आईसीसी की स्वायत्तता का समर्थन करने की बात कही है।
इस फैसले के बाद से पश्चिमी सहयोगियों के बीच मतभेद गहरा गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति द्वारा अंतरराष्ट्रीय अदालत को निशाना बनाने से बहुपक्षीय व्यवस्था (Multilateral Order) को गहरा झटका लगा है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य: भारत रोम नीति (Rome Statute) का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है और हमेशा से ही संप्रभु राष्ट्रों के आंतरिक मामलों में अंतरराष्ट्रीय अदालतों के अत्यधिक हस्तक्षेप के प्रति सतर्क रहा है।
हालांकि, भारत यह मानता है कि वैश्विक संस्थानों और बहुपक्षीय व्यवस्था का सम्मान होना चाहिए। भारत इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (Rules-Based International Order) के संतुलित क्रियान्वयन की मांग करता है।
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