भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से एक बहुत बड़ी और खौफनाक राजनीतिक उथल-पुथल की खबर आ रही है। इस्लामाबाद की केंद्र सरकार ने देश के सबसे अशांत और विपक्ष शासित प्रांत खैबर पख्तूनख्वा (KPK) पर शिकंजा कसते हुए वहां आधिकारिक रूप से 'इमरजेंसी' (आपातकाल) का ऐलान कर दिया है। पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार और सेना ने मिलकर प्रांतीय सरकार के अधिकारों को छीन लिया है, जिसके बाद पूरे प्रांत में भारी अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर दी गई है।
इस आपातकाल की वजह खैबर पख्तूनख्वा में लगातार बढ़ता उग्रवाद, टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) के हमले और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी (PTI) द्वारा फैलाया गया भीषण जन-आक्रोश बताया जा रहा है। इस्लामाबाद ने आरोप लगाया है कि प्रांतीय सरकार आतंकवाद पर लगाम लगाने में नाकाम रही है और देश में गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा कर रही है। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह वास्तव में विपक्ष को कुचलने और पाकिस्तानी सेना का पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने का एक फौजी दांव है।
इमरजेंसी लागू होते ही खैबर पख्तूनख्वा की सड़कों पर गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन गई है। हजारों की संख्या में लोग असैन्य अधिकारों की बहाली और सेना के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। पेशावर से लेकर स्वात घाटी तक इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं ठप कर दी गई हैं, और नेताओं को उठाकर अज्ञात स्थानों पर भेजा जा रहा है। डूरंड लाइन के पास तालिबानी उग्रवादियों ने भी इस राजनीतिक अराजकता का फायदा उठाकर कई सरकारी चौकियों पर हमले तेज कर दिए हैं, जिससे पाकिस्तान एक साथ कई मोर्चों पर झुलस रहा है।
भारतीय रक्षा तंत्र और सुरक्षा एजेंसियों के लिए पाकिस्तान की यह आंतरिक फूट बेहद गंभीर विषय है। इतिहास गवाह है कि जब भी पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक अस्थिरता या गृहयुद्ध जैसे हालात बनते हैं, तो वहां की फौजी एस्टेब्लिशमेंट और उग्रवादी गुट जनता का ध्यान भटकाने के लिए भारत की सीमाओं पर उकसावे की कार्रवाई या जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ की कोशिशें बढ़ा देते हैं। भारतीय सेना ने एलओसी (LoC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर चौकसी और अलर्ट लेवल बढ़ा दिया है।
इसके साथ ही, एक परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसी देश में इस तरह का चरमराता लोकतंत्र और सेना का मनमाना इमरजेंसी राज पूरे दक्षिण एशिया के लिए बहुत बड़ा खतरा है। अगर खैबर पख्तूनख्वा में हालात बेकाबू होते हैं और टीटीपी या अन्य उग्रवादी गुट वहां के सरकारी और सैन्य शस्त्रागारों पर कब्जा कर लेते हैं, तो वह उग्रवाद सीधे तौर पर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक नासूर बन सकता है। भारत की खुफिया एजेंसियां इस्लामाबाद और पेशावर के हर एक घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए हैं।
पाकिस्तान अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां से उसका उबरना बेहद मुश्किल दिख रहा है। क्या यह इमरजेंसी पाकिस्तान को पूरी तरह से एक तानाशाही फौजी हुकूमत की ओर ढकेल देगी या फिर जनता का यह आक्रोश पूरे इस्लामाबाद को अपने साथ बहा ले जाएगा? दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले कई महीनों तक बहुत बड़े झटके देने वाला है।
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