दक्षिण अमेरिका के महाद्वीप ब्राजील से आज सुबह एक बहुत बड़ा भू-राजनीतिक भूचाल सामने आया है। राष्ट्रपति चुनाव के आए अप्रत्याशित नतीजों में वामपंथी दिग्गज लुइज़ इनासियो लुला डा सिल्वा (Lula da Silva) ने दक्षिणपंथी उम्मीदवार फ्लेवियो बोल्सोनारो को करारी शिकस्त देते हुए ऐतिहासिक चौथी बार ब्राजील की सत्ता पर कब्जा जमा लिया है। जीत की घोषणा के तुरंत बाद राजधानी ब्रासीलिया की सड़कों पर लाखों समर्थकों का हुजूम उमड़ पड़ा।
अपनी जीत के बाद दिए पहले संबोधन में लुला ने अमेरिका पर सीधा तीखा हमला बोलते हुए कहा कि "ब्राजील किसी भी महाशक्ति का पिछवाड़ा (backyard) नहीं है"। लुला की इस कड़क बयानबाजी से वाशिंगटन के कूटनीतिक गलियारों में सन्नाटा छा गया है, क्योंकि इस राजनीतिक तख्तापलट के बाद लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभाव को बड़ा झटका माना जा रहा है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में लुला डा सिल्वा की यह ऐतिहासिक वापसी भारत की विदेश नीति और 'ब्रिक्स' (BRICS) संगठन के लिए एक बहुत बड़ा वरदान साबित होने जा रही है। भारत और ब्राजील के बीच संबंध हमेशा से मजबूत रहे हैं, और ब्रिक्स के मंच पर भारत, चीन, रूस के साथ ब्राजील की यह नई नेतृत्व भूमिका पश्चिमी दबदबे को खुली चुनौती देगी।
आर्थिक मोर्चे पर, भारत और ब्राजील के बीच इथेनॉल तकनीक, कृषि व्यापार, और रक्षा उपकरणों के क्षेत्र में बड़े समझौतों का नया दौर शुरू होने वाला है। लुला की नीतियां 'ग्लोबल साउथ' (Global South) को मजबूत करने के पक्ष में रही हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकासशील देशों की आवाज बनने की कूटनीति के बिल्कुल अनुकूल है।
हालाँकि, लुला के सामने देश की चरमराती अर्थव्यवस्था और विभाजित समाज को संभालना एक भारी चुनौती होगी। विश्व बाजार की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ब्राजील की यह नई सरकार वैश्विक ऊर्जा और व्यापार संतुलन में क्या नया कूटनीतिक मोड़ लाती है।
यह सनसनीखेज राजनीतिक बदलाव साबित करता है कि पश्चिमी शक्तियों के दबाव के बावजूद दुनिया के बड़े विकासशील देश अब अपनी शर्तों पर अपनी राष्ट्रीय और विदेश नीतियां तय कर रहे हैं।
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