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अर्थ संसार

मध्य पूर्व संकट से ऊर्जा बाजार में भूचाल: क्रूड ऑयल $107 के पार, भारत में फ्यूल रिटेलर्स पर दबाव

मध्य पूर्व (West Asia) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आपूर्ति बाधाओं के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई है।

कल्ट करंट डेस्क
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15 Sep 2026
Solar farm during sunset

मध्य पूर्व (West Asia) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आपूर्ति बाधाओं के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतें 3 प्रतिशत से अधिक की उछाल के साथ $107 प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं। तेल की कीमतों में आई इस अप्रत्याशित तेजी ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए महंगाई का नया संकट खड़ा कर दिया है।  

सऊदी अरब के तेल बुनियादी ढांचों पर हुए हमलों और प्रमुख पाइपलाइन बंद होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है। खाड़ी देशों से तेल और एलपीजी (LPG) आपूर्ति में आई गिरावट के चलते भारत ने भी अपनी आयात रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। आंकड़ों के अनुसार, भारत ने पिछले छह महीनों में अमेरिका से अपने एलपीजी आयात का हिस्सा 7.9% से बढ़ाकर 53% कर दिया है, ताकि घरेलू रसोई गैस आपूर्ति प्रभावित न हो।  

कच्चे तेल की कीमतों में आए इस उछाल का सीधा असर भारतीय तेल विपणन कंपनियों (Oil Marketing Companies) पर पड़ रहा है। वित्तीय विश्लेषकों का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम $100 के पार जाने से भारतीय फ्यूल रिटेलर्स को पेट्रोल पर करीब ₹5 प्रति लीटर और डीजल पर ₹20 प्रति लीटर से अधिक का घाटा सहन करना पड़ रहा है। इससे घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों में संशोधन का दबाव बढ़ गया है।  

सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और स्थिति से निपटने के लिए विभिन्न रणनीतिक तेल भंडारों (Strategic Petroleum Reserves) का उपयोग करने पर विचार कर रही है। वित्त मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों के बीच हुई बैठकों में यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि आम जनता पर तुरंत महंगाई का अतिरिक्त बोझ न पड़े। हालांकि, यदि वैश्विक स्तर पर तनाव लंबा खींचता है, तो खुदरा ईंधन की दरों में बदलाव अपरिहार्य हो सकता है।

ऊर्जा बाजार की इस अनिश्चितता का असर शेयर बाजारों और मुद्रा बाजार पर भी देखा जा रहा है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया दबाव में है, जबकि आयात लागत बढ़ने से देश के चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक मध्य पूर्व में कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता, तब तक वैश्विक ऊर्जा बाजार में यह अस्थिरता बनी रहेगी।