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नेशनल हेराल्ड केस: दिल्ली उच्च न्यायालय में गांधी परिवार की कानूनी दलीलें

नेशनल हेराल्ड से जुड़े धन शोधन (Money Laundering) के मामले में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक नया और तथ्यात्मक जवाब दाखिल किया है।

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
23 Sep 2026
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नेशनल हेराल्ड से जुड़े धन शोधन (Money Laundering) के मामले में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक नया और तथ्यात्मक जवाब दाखिल किया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका का विरोध करते हुए गांधी परिवार ने इस पूरी कानूनी कार्रवाई को "कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग" करार दिया है। उच्च न्यायालय ने इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध की है।

इस कानूनी जंग की मुख्य धुरी PMLA (धन शोधन निवारण अधिनियम) का दायरा है। गांधी परिवार के वकीलों का तर्क है कि ED का पूरा मामला भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा 2013 में दर्ज कराई गई एक 'निजी शिकायत' पर आधारित है। भारतीय कानूनी ढांचे में PMLA के तहत ED केवल तभी कार्रवाई कर सकती है जब किसी वैधानिक एजेंसी द्वारा FIR (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज की गई हो या पुलिस की कोई अंतिम रिपोर्ट मौजूद हो। किसी नागरिक की व्यक्तिगत शिकायत पर ED का सीधे जांच शुरू कर देना कानून के सिद्धांतों के विपरीत है।

याचिका में 2023 के ऐतिहासिक 'विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत सरकार' मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का विशेष उल्लेख किया गया है। इस फैसले के अनुसार, PMLA के तहत किसी भी जांच के लिए एक 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' (अनुसूचित अपराध) और उससे जुड़ी FIR का होना अनिवार्य शर्त है। गांधी परिवार ने तर्क दिया कि इस मामले में न तो सीबीआई ने और न ही दिल्ली पुलिस ने कोई FIR दर्ज की थी, इसलिए जांच एजेंसी के पास वित्तीय अनियमितता की सीधी जांच शुरू करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं बनता।

यह मामला केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं है, बल्कि भारत के राजनीतिक परिदृश्य को भी गहराई से प्रभावित करता है। कांग्रेस पार्टी इसे केंद्र सरकार द्वारा जांच एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बताकर पेश कर रही है, जबकि सत्ताधारी पक्ष इसे ₹2,000 करोड़ से अधिक की संपत्ति के अवैध हस्तांतरण के खिलाफ भ्रष्टाचार-विरोधी कार्रवाई के रूप में देखता है। निचली अदालत द्वारा ED की चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार करने के फैसले ने इस केस में विपक्षी खेमे को बड़ा नैतिक और कानूनी आधार दिया है।

यदि दिल्ली उच्च न्यायालय निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखता है, तो यह ED की जांच शक्तियों पर एक महत्वपूर्ण अंकुश लगाएगा। यह ऐतिहासिक फैसला यह तय करेगा कि क्या भविष्य में केंद्रीय एजेंसियां किसी गैर-सरकारी या व्यक्तिगत शिकायत के आधार पर PMLA के कठोर प्रावधानों का इस्तेमाल कर सकती हैं या नहीं। 12 अक्टूबर की सुनवाई पर देश के राजनीतिक और न्यायिक क्षेत्र की नजरें टिकी हुई हैं।