सितंबर 2026 के अंतिम सप्ताह में वैश्विक पटल पर भारत की कूटनीतिक गतिविधियां केंद्र में हैं। फ्लोरिडा में आयोजित होने वाले आगामी G20 शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दौरे की चर्चाएं जोरों पर हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निमंत्रण और मेजबानी में प्रस्तावित यह दौरा भारत-अमेरिका के रणनीतिक संबंधों के एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत दे रहा है। विदेश मंत्रालय के स्तर पर आधिकारिक तैयारियों के बीच यह वैश्विक मीडिया का मुख्य आकर्षण बन चुका है।
डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी प्रशासन में लौटने के बाद, पीएम मोदी और ट्रंप की यह मुलाकात वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक शक्ति-संतुलन के नजरिए से बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। इस द्विपक्षीय बैठक में व्यापार शुल्क (टैरिफ), हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता, और द्विपक्षीय रक्षा सौदों जैसे मुद्दों पर ठोस सहमति बनने की संभावना है। दोनों देशों के राष्ट्रध्यक्षों का एक-दूसरे के प्रति सकारात्मक रुख व्यापारिक जटिलताओं को सुलझाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
G20 सम्मेलन के ही मंच पर 'क्वाड' (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) देशों के राष्ट्राध्यक्षों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। क्वाड का प्राथमिक उद्देश्य हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था, मुक्त समुद्री आवाजाही और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना है। इस मंच से निकलने वाला साझा बयान बीजिंग के रणनीतिक और विस्तारवादी एजेंडे को संतुलित करने में एक मजबूत प्रतिरोध का काम करेगा।
अमेरिकी दौरे के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी की कनाडा यात्रा की खबरें भी सामने आ रही हैं। कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ प्रस्तावित बातचीत का मुख्य फोकस द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Trade Deal) को अंतिम रूप देना और पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच उपजे तनाव को समाप्त करना है। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह समझौता धरातल पर उतरता है, तो यह उत्तरी अमेरिका के बाजार में भारतीय व्यवसायों और प्रवासियों के लिए नए दरवाजे खोलेगा।
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के भारत का नेतृत्व करने के बाद, पीएम मोदी का यह उच्च-स्तरीय दौरा भारत को विश्व-मित्र (Global Ally) के रूप में स्थापित करता है। यह वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में भारत के राष्ट्रीय हितों, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के विविधीकरण और तकनीकी साझेदारी को मजबूती देने की दिशा में एक बेहद ठोस कदम सिद्ध होगा।