भारतीय विदेश नीति के तहत दक्षिण अमेरिका के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल की है। नई दिल्ली में आयोजित उच्च-स्तरीय बैठकों में विदेश मंत्री ने चिली और पेरू के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) और व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौतों (CEPA) को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने पर बल दिया। भारत की 'लैटिन अमेरिका कनेक्ट' नीति के तहत इसे एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है।
इस कूटनीतिक पहल का प्राथमिक फोकस भारत की ऊर्जा सुरक्षा और हरित ऊर्जा संक्रमण (Green Energy Transition) के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की आपूर्ति सुनिश्चित करना है। चिली और पेरू दुनिया में लिथियम और तांबे (Copper) के सबसे बड़े उत्पादकों में शामिल हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए लिथियम और कॉपर की निर्बाध आपूर्ति भारत के लिए बेहद रणनीतिक महत्व रखती है।
व्यापारिक दृष्टिकोण से, यह समझौता भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल्स, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और कृषि उत्पादों के लिए दक्षिण अमेरिकी बाजारों में सीधी पहुंच प्रदान करेगा। वर्तमान में उच्च शुल्क दरों के कारण भारतीय कंपनियों को इन बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। प्रस्तावित व्यापार समझौतों से इन बाधाओं को दूर करने में बड़ी मदद मिलेगी।
इसके साथ ही, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) के विविधीकरण की दिशा में भी यह बातचीत काफी अहम है। मौजूदा भू-राजनीतिक तनावों और वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में भारत केवल पारंपरिक व्यापारिक भागीदारों पर निर्भर रहने के बजाय लैटिन अमेरिका जैसे तेजी से बढ़ते आर्थिक क्षेत्रों के साथ अपने संबंधों का विस्तार कर रहा है।
निष्कर्षतः, भारत का दक्षिण अमेरिका की ओर यह कूटनीतिक झुकाव देश की दीर्घकालिक आर्थिक और औद्योगिक रणनीति का हिस्सा है। पेरू और चिली के साथ मजबूत होते व्यापारिक संबंध न केवल भारत की क्रिटिकल मिनरल सुरक्षा को पक्का करेंगे, बल्कि वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों के बीच एक मजबूत आर्थिक साझेदारी का मार्ग भी प्रशस्त करेंगे।