ब्रिक्स (BRICS) समूह द्वारा नए विकासशील देशों को शामिल करने और आपसी व्यापार के लिए स्थानीय मुद्राओं के उपयोग पर दिए जा रहे जोर ने वैश्विक वित्तीय प्रणाली में हलचल मचा दी है। डॉलर के वैश्विक आधिपत्य (Dollar Hegemony) के विकल्प तलाशने का यह प्रयास वैश्विक कूटनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो रहा है।
विकासशील देशों के बढ़ते प्रभाव के बीच वैश्विक घोषणापत्रों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया अब एकध्रुवीय (Unipolar) नहीं रही। विकासशील देश अब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों, जैसे आईएमएफ और विश्व बैंक में व्यापक सुधारों की मांग कर रहे हैं।
पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जाने वाले आर्थिक प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने के लिए वैश्विक दक्षिण के देश अब ब्रिक्स प्रणाली को एक वैकल्पिक मंच के रूप में देख रहे हैं। स्थानीय मुद्राओं में तेल और अन्य वस्तुओं का व्यापार इस बात का संकेत है कि दुनिया का आर्थिक संतुलन अब विविधता की ओर बढ़ रहा है।
चीन और रूस जहां ब्रिक्स को एक 'अमेरिका-विरोधी' (Anti-West) गुट के रूप में चित्रित करने की कोशिश में रहते हैं, वहीं भारत का रुख बेहद स्पष्ट है। भारत ब्रिक्स को 'गैर-पश्चिमी' (Non-West) मंच मानता है, न कि 'पश्चिम-विरोधी'। भारत किसी भी गुटबाज़ी का हिस्सा बने बिना अपनी आर्थिक संप्रभुता को प्राथमिकता देता है।
भारत अपनी डिजिटल भुगतान प्रणाली (UPI) और स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणालियों को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा दे रहा है। भारत ने यूएई और कई अन्य देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार को प्रोत्साहन दिया है, जो भारत को वैश्विक वित्तीय प्रणाली में अधिक स्वायत्तता और मजबूती प्रदान करता है।
ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज बनते हुए भारत ने यह साबित किया है कि वह क्वाड (QUAD) और ब्रिक्स (BRICS) दोनों मंचों पर समान प्रभाव से अपनी बात रख सकता है। भारत का यह कूटनीतिक संतुलन उसे दुनिया के नए बहुध्रुवीय ढांचे में एक अनिवार्य और केंद्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
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