दक्षिण चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य के नीले पानी में चीनी नौसेना ने अचानक इतिहास का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है। सैकड़ों युद्धपोत, परमाणु पनडुब्बियाँ और विमानवाहक पोत ताइवान द्वीप को चारों तरफ से घेर चुके हैं। ताइवान की खाड़ी से गुजरने वाले सभी व्यावसायिक जहाजों का रास्ता चीनी नौसेना द्वारा रोक दिया गया है, जिससे ऐसा लग रहा है कि बीजिंग ने ताइवान पर पूर्ण कब्जे का अपना आखिरी दांव चल दिया है।
ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने अपने सभी सैन्य अड्डों को 'रेड अलर्ट' पर रख दिया है और अपने मिसाइल डिफेंस सिस्टम को सक्रिय कर दिया है। ताइवान के राष्ट्रपति ने दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों से तुरंत सैन्य मदद की गुहार लगाई है। वाशिंगटन से राष्ट्रपति ने कड़ा रुख अपनाते हुए अमेरिकी पेसिफिक फ्लीट को युद्धपोतों के साथ ताइवान की ओर बढ़ने का आदेश दे दिया है, जिससे दो महाशक्तियों के बीच सीधा नौसैनिक टकराव कुछ ही दूरी पर नजर आ रहा है।
इस पूर्ण नाकेबंदी के कारण दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग ठप्प हो गया है। ताइवान से दुनिया भर को निर्यात होने वाले सबसे आधुनिक सेमीकंडक्टर और माइक्रोचिप्स का शिपमेंट रुक गया है। वैश्विक टेक कंपनियों में हाहाकार मच गया है; टेक दिग्गजों ने चेतावनी दी है कि यदि यह नाकेबंदी 48 घंटे और जारी रही, तो दुनिया भर में स्मार्टफोन, लैपटॉप और ऑटोमोबाइल का उत्पादन पूरी तरह बंद हो जाएगा।
भारतीय संदर्भ में, यह घटनाक्रम भारत की 'इंडो-पैसिफिक' रणनीति पर सीधा प्रहार है। भारत अपनी समुद्री सुरक्षा और व्यापार के लिए दक्षिण चीन सागर के निर्बाध उपयोग का समर्थन करता रहा है। यदि चीन ताइवान जलडमरूमध्य पर पूरी तरह अपना दबदबा कायम कर लेता है, तो भारत का पूर्वी एशियाई देशों के साथ होने वाला अरबों डॉलर का व्यापार चीन की दया पर निर्भर हो जाएगा, जो भारत को कतई मंजूर नहीं है।
इसके अलावा, भारत में तेजी से उभर रहे इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण और सेमीकंडक्टर मिशन के लिए यह नाकेबंदी एक दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ जहां ताइवानी चिप्स की कमी से भारतीय ऑटो और टेक कंपनियों को अल्पकालिक नुकसान होगा, वहीं दूसरी तरफ यह भारत को वैश्विक टेक कंपनियों के लिए एक सुरक्षित और वैकल्पिक निर्माण केंद्र बनने का बहुत बड़ा अवसर प्रदान करता है।
कूटनीति के गलियारों में, भारत ने 'क्वाड' (QUAD) सहयोगियों—अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर त्वरित रणनीतिक परामर्श शुरू कर दिया है। भारत ने स्पष्ट किया है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमाओं में नेविगेशन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। भारतीय नौसेना ने भी मलक्का जलडमरूमध्य के पास अपनी गश्त तेज कर दी है, ताकि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति का करारा जवाब दिया जा सके।
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