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दक्षिण प्रशांत द्वीप देशों का जलवायु न्याय के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख

ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र के बढ़ते जलस्तर से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे दक्षिण प्रशांत (South Pacific) के छोटे द्वीपीय देशों ने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कदम उठाया है। इन द्वीपीय राष्ट्रों के समूह ने जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ते हुए इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के सामने मजबूती से रखा है।

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
03 Oct 2026
Solar farm during sunset

ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र के बढ़ते जलस्तर से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे दक्षिण प्रशांत (South Pacific) के छोटे द्वीपीय देशों ने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कदम उठाया है। इन द्वीपीय राष्ट्रों के समूह ने जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ते हुए इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के सामने मजबूती से रखा है। अब तक केवल वित्तीय सहायता और अनुदान की मांग करने वाले इन छोटे देशों ने इस मामले को मानव अधिकारों के उल्लंघन और औद्योगिक देशों की कानूनी जिम्मेदारी के रूप में मोड़ दिया है।

प्रशांत महासागर में स्थित ये छोटे देश लगातार आते चक्रवातों, तटीय कटाव और पीने के पानी के खारे होने की गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं। कई द्वीपों के पूरी तरह जलमग्न होने का खतरा मंडरा रहा है। इन देशों का तर्क है कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में उनका योगदान नगण्य है, लेकिन इसका सबसे पहला और भयानक खामियाजा उन्हीं को भुगतना पड़ रहा है। इसलिए वे बड़े औद्योगिक देशों से कानूनी रूप से हर्जाना और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।

यह कानूनी पहल वैश्विक पर्यावरण कूटनीति के इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित हो सकती है। यदि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय इन द्वीपीय देशों के पक्ष में कोई राय या आदेश जारी करता है, तो अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर कार्बन उत्सर्जन में तेजी से कटौती करने और क्षतिपूर्ति कोष बनाने का कानूनी दबाव बेहद बढ़ जाएगा। इससे वैश्विक पर्यावरण सम्मेलनों का पूरा ढांचा बदल सकता है।

विकसित देश इस कदम को लेकर असहज स्थिति में हैं, क्योंकि यह याचिका जलवायु परिवर्तन को एक राजनीतिक मुद्दे से हटाकर 'राज्य की कानूनी जिम्मेदारी' (State Responsibility) के दायरे में लाती है। इस ऐतिहासिक मुकदमे पर दुनिया भर के पर्यावरणविदों, कानूनी विशेषज्ञों और सरकारों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व और वैश्विक न्याय का फैसला करेगा।

भारत खुद को वैश्विक दक्षिण (Global South) की बुलंद आवाज के रूप में स्थापित कर चुका है। प्रशांत द्वीपीय देशों की यह न्यायपूर्ण मांग भारत के उस रुख का समर्थन करती है, जिसमें विकसित देशों को ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी लेने और विकासशील देशों को जलवायु वित्त (Climate Finance) प्रदान करने के लिए कहा जाता रहा है। भारत 'फ़ोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन' (FIPIC) के माध्यम से इन द्वीपीय राष्ट्रों को सोलर ग्रिड, आपदा प्रबंधन और तकनीकी सहायता मुहैया कराता रहा है। यह कदम वैश्विक मंचों पर भारत की जलवायु नेतृत्व क्षमता को और अधिक निखारेगा।  

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