भारतीय सिनेमा, रंगमंच और करोड़ों दिलों पर अपनी बेबाक छाप छोड़ने वाले दिग्गज अभिनेता विश्वनाथ पाटेकर, जिन्हें दुनिया प्यार से 'नाना पाटेकर' कहती थी, का 75 वर्ष की आयु में गोवा स्थित उनके निवास पर दिल का दौरा (कार्डियक अरेस्ट) पड़ने से निधन हो गया। तड़के करीब 4:30 बजे जब पूरे देश में भोर की लालिमा फूट रही थी, तभी डोना पौला स्थित उनके साधारण घर में यह अनहोनी घटी। परिजन उन्हें अचेत अवस्था में निकटतम मणिपाल अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों की टीम ने लगातार 45 मिनट तक सीपीआर देकर उनकी सांसों को वापस लाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुबह 5:15 बजे डॉक्टरों ने जैसे ही उन्हें मृत घोषित किया, यह खबर दावानल की तरह फैल गई और पूरे देश का दिल दहल उठा।
नाना पाटेकर केवल एक अभिनेता नहीं थे, वे एक चलती-फिरती संवेदना थे—एक ऐसा उबलता हुआ गुस्सा जो समाज की नाइंसाफी और व्यवस्था की लाचारी पर हर पल बरसता था। 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'अग्नि साक्षी', 'अंगार', 'खामोशी', 'अपहरण', 'वेलकम' और 'राजनीति' जैसी अनगिनत फिल्मों में उनका अभिनय सिर्फ पर्दे पर डायलॉग बोलना नहीं था, बल्कि किसी आम इंसान के कलेजे की छटपटाहट को पर्दे पर उकेर देना था। 'क्रांतिवीर' का वह दृश्य जिसमें वे अपनी उंगली काटकर खून का रंग पूछते हैं, आज भी हर भारतीय के जमीर को झकझोर देता है। तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों और पद्म श्री से सम्मानित नाना ने सफलता के गगनचुंबी शिखरों को छुआ, लेकिन उनका दिल हमेशा माटी की खुशबू और आम आदमी की पीड़ा से जुड़ा रहा।
परदे की चकाचौंध से परे, नाना का असली जीवन किसी तपस्वी से कम नहीं था। जब महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में सूखे की वजह से किसान बदहाली और आत्महत्या की कगार पर थे, तब मुंबई की एसी गाड़ियों और आलीशान बंगलों में रहने वाले कई सितारे खामोश थे, लेकिन नाना की रूह कांप उठी थी। उन्होंने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उठाकर उन लाचार किसान परिवारों की झोलियों में डाल दिया। इसके बाद उन्होंने 'नाम फाउंडेशन' (Naam Foundation) की नींव रखी। वे खुद चिलचिलाती धूप में गांव-गांव घूमे, फटे हाल किसानों को गले लगाया, विधवाओं के आंसू पोंछे और नदियों के पुनरुद्धार का काम शुरू कराया। नाना जब किसी रोते हुए किसान के कंधे पर हाथ रखते थे, तो वह अभिनय नहीं, एक भाई का अटूट सहारा होता था।
नाना की देशभक्ति में भी कोई दिखावा नहीं था। वर्ष 1999 में जब कारगिल की पहाड़ियों पर भारत के वीर जवान गोलियों का सामना कर रहे थे, तब नाना ने अपनी फ़िल्मी शूटिंग बीच में छोड़ दी। वे कोई भाषण देने नहीं गए थे, बल्कि खुद सेना की वर्दी पहनकर मराठा लाइट इन्फेंट्री के साथ सीमा पर जा डटे। उन्होंने कई हफ्तों तक जवानों के साथ सूखी रोटियां खाईं, बंकरों में वक्त बिताया और उनका हौसला बढ़ाया। ऐसा अद्भुत और निष्काम देशभक्त भारतीय सिनेमा के इतिहास में दूसरा नहीं हुआ।
उनके इस आकस्मिक निधन की खबर से देश का हर वर्ग स्तब्ध है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि नाना पाटेकर का जाना भारतीय कला और सामाजिक जीवन के लिए एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री सहित सभी प्रमुख राजनेताओं ने उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि दी। महाराष्ट्र सरकार ने राजकीय सम्मान (State Honours) के साथ उनके अंतिम संस्कार की घोषणा की है।
फिल्म जगत के उनके साथियों का तो जैसे सहारा ही छूट गया है। अमिताभ बच्चन, रजनीकांत, अक्षय कुमार और मनोज बाजपेयी जैसे कलाकारों ने अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। उनके करीबियों ने रोते हुए याद किया कि अभी तीन दिन पहले ही वे बिल्कुल स्वस्थ थे और अपने छोटे से बगीचे में पौधे लगा रहे थे। निधन से महज चार दिन पहले डोना पौला में एक छोटे से सामाजिक कार्यक्रम में जब कुछ लोगों ने उनकी सादगी की तारीफ की, तो उन्होंने अपनी कड़क लेकिन धीमी आवाज में कहा था, "अरे भाई! यह शरीर तो मिट्टी का पुतला है, कल यही माटी में मिल जाना है... बस जब तक सांस है, किसी रोते हुए के आंसू पोंछ सको तो जिंदगी सफल है।" उनके ये आखिरी शब्द आज हर आंख को भिगो रहे हैं।
नाना पाटेकर उस पीढ़ी के आखरी मसीहा थे जिन्होंने अपनी शर्तों पर जिंदगी जी और हमेशा गरीबों, लाचारों की आवाज बने। उन्होंने कभी स्टारडम का घमंड नहीं किया, एक साधारण कुर्ते-पजामे में घूमना और जमीनी लोगों के साथ बैठकर खाना खाना ही उनकी पहचान थी। आज जब उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शनों के लिए रखा गया है, तो केवल सिनेमा प्रेमी ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के उन दूर-दराज गांवों के हजारों किसान भी रो रहे हैं, जिनके लिए नाना किसी देवदूत से कम नहीं थे।
भारतीय सिनेमा का यह शेरों जैसा जिगर रखने वाला 'क्रांतिवीर' भले ही शांत हो गया हो, लेकिन उनका गुस्सा, उनकी सादगी, उनका समर्पण और 'नाम फाउंडेशन' के जरिए बोए गए इंसानियत के बीज युगों-युगों तक इस देश के लोगों को राह दिखाते रहेंगे।
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