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अफ्रीका में अचानक तख्तापलट का धमाका

साहिल क्षेत्र के एक और महत्वपूर्ण अफ्रीकी देश में तख्तापलट की अचानक हुई घटना ने पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्तब्ध कर दिया है। सशस्त्र सैन्य टुकड़ियों ने राजधानी स्थित राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रीय रेडियो-टीव्ही स्टेशन को घेरकर सरकार का तख्तापलट करने का ऐलान कर दिया है।

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
09 Oct 2026
Solar farm during sunset

साहिल क्षेत्र के एक और महत्वपूर्ण अफ्रीकी देश में तख्तापलट की अचानक हुई घटना ने पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्तब्ध कर दिया है। सशस्त्र सैन्य टुकड़ियों ने राजधानी स्थित राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रीय रेडियो-टीव्ही स्टेशन को घेरकर सरकार का तख्तापलट करने का ऐलान कर दिया है। ब्लूमबर्ग और ले मोंडे की रिपोर्ट के अनुसार, तख्तापलट करने वाले सैन्य कमांडर ने देश के संविधान को निलंबित करते हुए सभी सीमाओं को सील कर दिया है। राजधानी की सड़कों पर टैंक दौड़ रहे हैं और भारी गोलीबारी की आवाजें सुनी गई हैं।

​यह तख्तापलट केवल एक देश का आंतरिक मामला नहीं है, बल्कि पश्चिमी शक्तियों, विशेषकर फ्रांस और अमेरिका के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। पिछले कुछ वर्षों में साहिल क्षेत्र के कई देश पश्चिमी देशों का साथ छोड़कर रूस के निजी सैन्य समूह (वैगनर/अफ्रीका कोर) और चीन के पाले में खड़े होते दिखे हैं। इस ताजा तख्तापलट के पीछे भी विदेशी शक्तियों की रणनीतिक शह होने की आशंका जताई जा रही है। अफ्रीका के इस इलाके में पश्चिमी प्रभाव का तेजी से खत्म होना वैश्विक सत्ता परिवर्तन का बड़ा संकेत है।

​तख्तापलट के तुरंत बाद सड़कों पर उतरी भीड़ ने विदेशी विरोधी और रूस समर्थक नारे लगाए, जिससे इस घटना के भू-राजनीतिक आयाम साफ नजर आने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र, अफ्रीकी संघ और यूरोपीय संघ ने इस असंवैधानिक तख्तापलट की कड़े शब्दों में निंदा की है और राष्ट्रपति को तुरंत बहाल करने की मांग की है। हालांकि, सैन्य जुंटा ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी बाहरी दबाव या प्रतिबंध की परवाह नहीं करेगा और देश की सुरक्षा के नाम पर सत्ता पर अपना पूर्ण नियंत्रण बनाए रखेगा।

​इस तख्तापलट का सबसे खौफनाक असर इस क्षेत्र में काम कर रहे अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी और आतंकवादी गुटों पर पड़ सकता है। सरकार और सेना के बीच मचे इस राजनीतिक शून्य का फायदा उठाकर कट्टरपंथी संगठन फिर से पैर पसार सकते हैं। यदि यह क्षेत्र अस्थिरता के दलदल में डूबता है, तो यूरोप की ओर अवैध शरणार्थियों का एक नया और अनियंत्रित सैलाब उमड़ पड़ेगा, जो पहले से ही आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से जूझ रहे यूरोपीय देशों के लिए संभालना नामुमकिन हो जाएगा।

​भारत के नजरिए से देखा जाए तो अफ्रीका में बढ़ती यह राजनीतिक अस्थिरता चिंताजनक है, क्योंकि भारत ने पिछले दशक में अफ्रीकी महाद्वीप के साथ अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को बहुत मजबूत किया है। भारत के कई व्यापारिक और अवसंरचनात्मक प्रोजेक्ट्स इस क्षेत्र में चल रहे हैं। इसके अलावा, भारत अफ्रीका को 'ग्लोबल साउथ' की आवाज के रूप में देखता है। अफ्रीका में इस तरह का अस्थिर माहौल भारतीय निवेश की सुरक्षा को खतरे में डालता है और वहां मौजूद भारतीय समुदाय के लिए भी सुरक्षा चुनौतियां खड़ी करता है।

​अफ्रीका का यह नया तख्तापलट इस बात की गवाही दे रहा है कि वैश्विक कूटनीति के पुराने नियम अब पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं। लोकतंत्र और तानाशाही के बीच छिड़ी यह जंग अब तीसरी दुनिया के देशों को अपना अखाड़ा बना रही है। राजधानी में छाई यह शांति तूफान से पहले की खामोशी लग रही है, और यदि इस संकट को तुरंत नहीं सुलझाया गया, तो पूरा साहिल क्षेत्र एक बड़े गृहयुद्ध की चपेट में आ जाएगा जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई देगी।

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