राजधानी दिल्ली के गलियारों से आज एक ऐसा भूकम्प लाने वाला दृश्य सामने आया है, जिसने लोकतंत्र के हर एक प्रहरी की रूह कंपा दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ जंतर-मंतर पर होने वाले एक विशाल और बहुप्रतीक्षित प्रदर्शन को कुचलने के लिए दिल्ली पुलिस ने आज सुबह से ही राजधानी में अघोषित आपातकाल का तांडव शुरू कर दिया। सूरज की पहली किरण के साथ ही पूरी दिल्ली को एक विशाल छावनी में तब्दील कर दिया गया, जहां हर चौराहे पर रैपिड एक्शन फोर्स और अर्धसैनिक बलों के भारी पहरे बिठा दिए गए। इस अभूतपूर्व और खौफनाक क्रैकडाउन के दौरान प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे हजारों नागरिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बेरहमी से घसीट लिया गया।
इस तानाशाही कार्रवाई की आग का दायरा सिर्फ जंतर-मंतर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दिल्ली आने वाले हर एक रास्ते और हवाई अड्डे को इसके दायरे में ले लिया गया। जैसे ही विमान से देश के अलग-अलग हिस्सों से आंदोलन के प्रमुख चेहरे—अभिजीत दिपके, सौरभ दास और आशुतोष रांका—दिल्ली पहुंचे, पुलिस ने उन्हें विमान के दरवाजे पर ही घेर लिया। इतना ही नहीं, देश के जाने-माने और लोकप्रिय यूट्यूबर ध्रुव राठी को भी उनके गुरुग्राम स्थित आवास से अलसुबह ही पुलिस ने उठा लिया। जंतर-मंतर की तरफ जाने वाली सभी सड़कों को पूरी तरह सील कर दिया गया, और दर्जनों मेट्रो स्टेशनों के गेट अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिए गए।
सुबह-सुबह सफर करने निकले आम यात्रियों को इस अचानक हुई जबर्दस्त बंदी के कारण भयंकर मानसिक और शारीरिक यातना झेलनी पड़ी। ऑफिस जाने वाले लोग और छात्र घंटों तक सड़कों और मेट्रो स्टेशनों के बाहर फंसे रहे, जिन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर शहर में चल क्या रहा है। सार्वजनिक परिवहन के ठप होने से आम जनता का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया और सड़कों पर लंबा ट्रैफिक जाम लग गया। पुलिस की इस भारी बैरिकेडिंग और सुरक्षा घेरे ने आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी को एक तरह से पूरी तरह से बंधक बना लिया था।
मानवीय दृष्टिकोण से इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो आज राष्ट्रीय राजधानी में जिस तरह से आम नागरिकों के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घोंटा गया, उसने हर संवेदनशील दिल को झकझोर कर रख दिया है। जो युवा और आम लोग अपने मताधिकार की शुद्धता और निष्पक्ष चुनावों की मांग को लेकर दूर-दराज के गांवों से उम्मीदें लेकर दिल्ली पहुंचे थे, उन्हें अपराधियों की तरह दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। सड़कों पर पसरे उस भयावह सन्नाटे और पुलिस के बूटों की गूंज के बीच दिल्ली की आज की यह तस्वीर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला और दर्दनाक अध्याय बनकर उभर आई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के सामूहिक दमन से सरकार भले ही तात्कालिक तौर पर विरोध प्रदर्शन को रोक पाने में सफल हो गई हो, लेकिन जनता के दिलों में सुलगती नाराजगी और अधिक भड़क उठी है। जब लोकतांत्रिक संवाद के सभी रास्तों को बलपूर्वक बंद कर दिया जाता है, तो असंतोष और अधिक विस्फोटक रूप लेकर सामने आता है। इतिहास गवाह है कि विचारों और आंदोलनों को पुलिस की लाठियों से लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता, बल्कि इससे जनता के भीतर सरकार के प्रति अविश्वास और गहरा होता चला जाता है।
आने वाले दिनों में इस खौफनाक क्रैकडाउन के देश की राजनीति पर बहुत दूरगामी और गहरे परिणाम देखने को मिल सकते हैं। विपक्ष ने इस पूरे मामले को लेकर सरकार के खिलाफ एकजुट होकर बड़े स्तर पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ने का ऐलान कर दिया है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प और चिंताजनक होगा कि देश की राजधानी में लोकतंत्र की इस खुली हत्या के बाद आम जनता और राजनीतिक दल किस प्रकार से अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और यह सुलगता हुआ राजनीतिक संकट किस नए मोड़ पर जाकर थमता है।
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