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अमेरिका-चीन टेक जंग तेज

दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों—अमेरिका और चीन—के बीच जारी ट्रेड वॉर में एक नया और सनसनीखेज मोड़ आ गया है। दोनों देशों ने अपने बीच जारी 'टैरिफ युद्ध' को टालने वाले अस्थाई समझौते (Trade Truce) को केवल दो महीने के लिए आगे बढ़ाया है।

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
13 Oct 2026
Solar farm during sunset

दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों—अमेरिका और चीन—के बीच जारी ट्रेड वॉर में एक नया और सनसनीखेज मोड़ आ गया है। दोनों देशों ने अपने बीच जारी 'टैरिफ युद्ध' को टालने वाले अस्थाई समझौते (Trade Truce) को केवल दो महीने के लिए आगे बढ़ाया है। इतनी कम अवधि के विस्तार से यह स्पष्ट हो गया है कि पर्दे के पीछे वाशिंगटन और बीजिंग के बीच गंभीर मतभेद बने हुए हैं और दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था UNCTAD की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 के बाद से अमेरिका और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 20% से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिका द्वारा सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्रिटिकल मिनरल्स के निर्यात पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने चीनी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। चीन अब जवाबी कार्रवाई के रूप में दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) की आपूर्ति रोकने की धमकी दे रहा है।

यह तकरार इसलिए भी बेहद संवेदनशील हो गई है क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर चिप्स अब वैश्विक मर्चेंडाइज ट्रेड के सबसे बड़े चालक बन चुके हैं। UNCTAD ने चेतावनी दी है कि एआई और चिप्स से जुड़ी तकनीक कुछ ही मुट्ठी भर टेक कंपनियों के हाथों में केंद्रित हो रही है। इससे न केवल वैश्विक वित्तीय स्थिरता को खतरा पैदा हो गया है, बल्कि नई कंपनियों और उभरते देशों के लिए इस आधुनिक तकनीक तक पहुंचना लगभग नामुमकिन होता जा रहा है।

आगामी महीनों में मियामी में होने वाले जी-20 सम्मेलन और एशिया-पैसिफिक (APEC) बैठकों के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आमने-सामने की मुलाकात हो सकती है। अमेरिका चाहता है कि चीन अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाए और तकनीक चोरी बंद करे, जबकि चीन ताइवान पर अमेरिकी रुख में ढील और टैरिफ में कटौती की मांग कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई और एडवांस टेक को लेकर जारी यह खींचतान कभी भी एक बड़े वित्तीय संकट का रूप ले सकती है।

अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते इस फासले से भारत के लिए 'मेक इन इंडिया' और 'सेमीकंडक्टर मिशन' को पंख लगाने का स्वर्णिम अवसर पैदा हो गया है। वैश्विक कंपनियां अब चीन से बाहर निकलकर 'चीन+1' (China Plus One) की रणनीति पर काम कर रही हैं। भारत एआई आपूर्ति श्रृंखला, इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग और टेक असेंबलिंग के क्षेत्र में एक मजबूत विकल्प बनकर उभर रहा है, जिसका सीधा फायदा भारतीय युवाओं को रोजगार के रूप में मिलेगा।

हालांकि, अगर एआई और सेमीकंडक्टर चिप्स का व्यापार अमेरिका-चीन तनातनी के कारण बाधित होता है, तो भारत के तेजी से बढ़ते टेक और स्टार्टअप सेक्टर पर भी इसका आंशिक असर पड़ सकता है। भारत को अपनी रक्षा और एआई प्रौद्योगिकियों के लिए क्रिटिकल मिनरल्स की आवश्यकता है। इसलिए, नई दिल्ली को अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत रखते हुए चीन पर अपनी तकनीकी निर्भरता को पूरी तरह शून्य करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने होंगे।

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