वर्ष 2026 के शांति नोबेल पुरस्कार की आधिकारिक घोषणा कर दी गई है। इस बार यह सर्वोच्च वैश्विक सम्मान संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार उच्च आयुक्त और दक्षिण अफ्रीका की प्रख्यात न्यायविद् नावी पिल्लई (Navi Pillay) को देने का फैसला किया गया है। अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने और युद्ध अपराधों के खिलाफ जीवन भर निडर होकर आवाज उठाने के लिए उन्हें इस ऐतिहासिक पुरस्कार से नवाजा गया है।
नोबेल समिति ने नावी पिल्लई के दीर्घकालिक प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने दुनिया भर में मानवाधिकारों की रक्षा और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए जो मानदंड स्थापित किए हैं, वे मिसाल हैं। रवांडा नरसंहार और पूर्व युगोस्लाविया से जुड़े अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरणों में उनके ऐतिहासिक फैसलों ने वैश्विक न्याय प्रणाली की बुनियाद को मजबूत किया था।
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब पूरी दुनिया मध्य पूर्व, पूर्वी यूरोप और अफ्रीका में खूनी संघर्षों तथा मानवाधिकारों के अभूतपूर्व हनन का सामना कर रही है। ऐसे वैश्विक तनाव के बीच नावी पिल्लई को शांति का नोबेल मिलना दुनिया भर के तानाशाहों और युद्ध अपराध में लिप्त ताकतों के लिए एक सख्त संदेश माना जा रहा है।
वैश्विक मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने इस निर्णय का पुरजोर स्वागत किया है। हालांकि, कतिपय आक्रामक रुख रखने वाले पश्चिमी और एशियाई देशों के लिए यह फैसला सहज नहीं है, क्योंकि नावी पिल्लई ने अपने कार्यकाल के दौरान महाशक्तियों द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघनों पर भी कभी खामोशी नहीं साधी थी।
भारत के लिए नावी पिल्लई का नोबेल विजेता बनना विशेष अर्थ रखता है। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के परिवार में जन्मीं नावी पिल्लई ने रंगभेद (Apartheid) के खिलाफ महात्मा गांधी के अहिंसक विचारों से प्रेरणा लेकर अपने कानूनी करियर की शुरुआत की थी। उन्होंने रंगभेद विरोधी आंदोलन के दौरान नेल्सन मंडेला सहित कई महान नेताओं के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी थी।
भारत हमेशा से वैश्विक मंचों पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों के निष्पक्ष पालन और बहुपक्षीय न्याय प्रणाली का समर्थक रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय और न्यायशास्त्र से जुड़े दिग्गजों ने इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त किया है। नावी पिल्लई का यह सम्मान वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों और भारतीय मूल की महिलाओं के लिए एक महान प्रेरणा की तरह देखा जा रहा है।
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