प्रशांत महासागर के उस पार एक ऐसी भारी-भरकम आर्थिक और सैन्य डील हुई है जिसने बीजिंग के होश उड़ा दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ताइवान के बीच 80 बिलियन डॉलर के ऐतिहासिक अलास्का एलएनजी (LNG) सौदे पर मुहर लग चुकी है। इस अप्रत्याशित समझौते के तहत ताइवान अलास्का प्रोजेक्ट से निकलने वाले 30% एलएनजी का सीधा उठाव करेगा और 4.4 बिलियन डॉलर का भारी-भरकम प्रत्यक्ष निवेश अमेरिका में ठोकेगा। ताइपे के इस कदम को सीधे तौर पर अमेरिका से अपनी सुरक्षा गारंटी की अंतिम किस्त खरीदने के रूप में देखा जा रहा है।
बीजिंग से आ रही खबरें बताती हैं कि चीनी रक्षा मंत्रालय और राष्ट्रपति शी जिनपिंग का खेमा इस डील से आगबबूला है। चीन लंबे समय से ताइवान पर आर्थिक घेराबंदी करने की फिराक में था, लेकिन ट्रम्प की इस मेगा-डील ने ताइवान की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे अमेरिकी रक्षा तंत्र से जोड़ दिया है। बीजिंग ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी ऊर्जा पर ताइवान की यह निर्भरता और अलास्का में इतनी बड़ी ताइवानी मौजूदगी उसके "एक चीन सिद्धांत" का खुला उल्लंघन है और इसका जवाब सैन्य अभ्यास के रूप में दिया जाएगा।
इस डील की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह सिर्फ गैस या पैसे का लेनदेन नहीं है। अलास्का के जरिए ताइवान अब अमेरिकी ऊर्जा बुनियादी ढांचे का सीधा हिस्सेदार बन गया है। अगर चीन ताइवान जलडमरूमध्य में नाकेबंदी करता है, तो अमेरिका सीधे तौर पर यह दावा कर सकता है कि उसके अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों पर हमला हुआ है। ट्रम्प ने एक तरह से बिना कोई युद्ध लड़े ताइवान की सुरक्षा को अमेरिकी अर्थव्यवस्था के साथ नत्थी कर दिया है, जिससे चीन के लिए युद्ध का जोखिम और ज्यादा बढ़ गया है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो यह घटनाक्रम भारत की 'इंडो-पैसिफिक रणनीति' और घरेलू ऊर्जा प्राथमिकताओं को बहुत गहराई से प्रभावित करता है। भारत लगातार मलक्का जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर में मुक्त आवाजाही की वकालत करता रहा है। अगर अलास्का-ताइवान डील से अमेरिका और चीन के बीच दक्षिण चीन सागर में नौसैनिक तनातनी बढ़ती है, तो भारत के कमर्शियल शिपिंग रूट्स पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे, जिससे आयातित ईंधन की लागत बढ़ सकती है।
इसके साथ ही, भारत भी वैश्विक ऊर्जा बाजार से अपने लिए सस्ते और दीर्घकालिक एलएनजी सौदों की तलाश कर रहा है। अमेरिका से ताइवान द्वारा इतना बड़ा एलएनजी कोटा हथिया लेने से वैश्विक बाजार में गैस की उपलब्धता पर असर पड़ेगा, जिससे भारतीय सार्वजनिक उपक्रमों (जैसे गेल और आईओसी) को महंगे दामों पर एलएनजी खरीदनी पड़ सकती है। भारत की सेमीकंडक्टर नीतियां भी ताइवान की स्थिरता पर निर्भर हैं, इसलिए इस क्षेत्र में बढ़ता तनाव भारत की टेक-इंडस्ट्री के लिए खतरे की घंटी है।
वैश्विक बाजार और जियोपॉलिटिक्स के पंडित इसे दशक का सबसे बड़ा 'एनर्जी-गेम' मान रहे हैं। एक तरफ जहां अमेरिका अपने ऊर्जा संसाधनों को बेचकर अरबों डॉलर कमा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ताइवान ने चीन की मिसाइलों के साए के बीच अपनी अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत अमेरिकी ढाल खरीद ली है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि चीन इस अमेरिकी चाल का जवाब प्रशांत महासागर में किस तरह के नौसैनिक आक्रामक दांव से देता है।
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