लद्दाख के पर्यावरणविद्, प्रख्यात शिक्षाविद और 'थ्री इडियट्स' के फुंसुक वांगडू के मुख्य प्रेरणास्रोत सोनम वांगचुक एक बार फिर देश की सुर्खियों में हैं। लद्दाख के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की सुरक्षा और इसे संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर उनके द्वारा किए गए अनशन ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। शून्य से नीचे तापमान में किए गए इस कठिन तप ने हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है, जिससे सरकार पर नीतिगत कदम उठाने का दबाव बढ़ा है।
वांगचुक के आंदोलन के व्यापक होते ही राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें तेज हो गईं कि क्या वे राजनीति में प्रवेश करने की योजना बना रहे हैं। इन कयासों पर विराम लगाते हुए सोनम वांगचुक ने एक बेहद मुखर और स्पष्ट बयान जारी किया है। उन्होंने साफ कहा कि उनका अनशन या आंदोलन किसी राजनीतिक पद, चुनावी महत्वाकांक्षा या सत्ता की भूख से प्रेरित नहीं है। उनका एकमात्र उद्देश्य लद्दाख के जल, जंगल, जमीन और वहां की जनजातीय संस्कृति की रक्षा करना है, जिसे अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और अनियंत्रित पर्यटन से भारी खतरा है।
लद्दाख का भूगोल बेहद संवेदनशील है, जहां ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और पानी का संकट गहराता जा रहा है। वांगचुक का तर्क है कि यदि लद्दाख को छठी अनुसूची का सुरक्षा कवच नहीं मिला, तो बाहरी व्यावसायिक गतिविधियां यहां के पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाएंगी। उनके अनुसार, स्थानीय समुदायों को ही अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन का अधिकार मिलना चाहिए। उनका आंदोलन केवल एक क्षेत्रीय मांग नहीं, बल्कि संपूर्ण वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में एक चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए।
हालांकि, उनके आंदोलन को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। जहां एक ओर देश-विदेश के पर्यावरण प्रेमी और युवा उनके समर्थन में खड़े हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ हलकों में इस आंदोलन के समय और तरीकों पर सवाल उठाए गए हैं। इसके बावजूद, वांगचुक का कहना है कि वे किसी दल के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे व्यवस्था को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना चाहते हैं। उन्होंने संवाद के रास्ते खुले रखने की बात कही है ताकि लद्दाख के भविष्य के लिए एक संतुलित समाधान निकाला जा सके।
सोनम वांगचुक का यह बयान और संघर्ष यह साबित करता है कि नागरिक सक्रियता का उद्देश्य हमेशा चुनावी लाभ नहीं होता। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को जन-आंदोलन बनाकर यह संदेश दिया है कि विकास की कीमत प्रकृति को नष्ट करके नहीं चुकाई जानी चाहिए। उनका यह रुख देश के अन्य संवेदनशील पर्वतीय राज्यों के लिए भी एक मिसाल पेश करता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना कितना अनिवार्य है।