पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर एक बार फिर जन-आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। लेह में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने 20 किलोमीटर लंबी सांकेतिक पदयात्रा का ऐलान किया, जिसका उद्देश्य केंद्र सरकार तक लद्दाख की जनता की सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक चिंताओं को पहुंचाना है। वांगचुक का कहना है कि लद्दाख के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय जनजातीय आबादी के अधिकारों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक संरक्षण बेहद जरूरी है।
इस आंदोलन को लद्दाख के स्थानीय संगठनों, एपेक्स बॉडी लेह और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) का भी व्यापक समर्थन मिल रहा है। वांगचुक ने स्पष्ट किया कि यह पदयात्रा पूरी तरह से अहिंसक और शांतिपूर्ण होगी, जिसमें स्थानीय युवा, महिलाएं और बुजुर्ग बड़ी संख्या में हिस्सा लेंगे। आंदोलनकारियों का तर्क है कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद से लद्दाख के पास अपनी प्रतिनिधि सरकार नहीं है, जिससे स्थानीय फैसले लेने की प्रक्रिया में जनता की भागीदारी खत्म हो गई है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन का कहना है कि लद्दाख के विकास और सुरक्षा के लिए कई उच्चस्तरीय बैठकें की जा चुकी हैं। सरकार ने लद्दाख की भाषा, संस्कृति और भूमि के संरक्षण के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति (HPC) के माध्यम से संवाद बनाए रखने का आश्वासन दिया है। हालांकि, स्थानीय प्रदर्शनकारी केवल बातचीत के बजाय ठोस संवैधानिक संशोधनों और नीतिगत फैसलों की मांग पर अड़े हुए हैं।
इस पदयात्रा के आह्वान के बाद लेह और आसपास के इलाकों में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। प्रशासन ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। वांगचुक ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार उनकी बुनियादी मांगों पर ध्यान नहीं देती है, तो यह सांकेतिक यात्रा एक बड़े और दीर्घकालिक भूख हड़ताल आंदोलन का रूप ले सकती है, जिससे इस सीमावर्ती क्षेत्र की राजनीति पर गहरा असर पड़ सकता है।
लद्दाख में हो रहे इस विरोध प्रदर्शन ने देश भर के पर्यावरणविदों और नागरिक अधिकारों से जुड़े संगठनों का ध्यान आकर्षित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में अनियंत्रित औद्योगिक विकास और पर्यटन से पर्यावरण को भारी नुकसान हो सकता है। ऐसे में सोनम वांगचुक का यह कदम केंद्र सरकार के लिए एक नई कूटनीतिक और प्रशासनिक चुनौती पेश कर रहा है, जिसका समाधान केवल द्विपक्षीय बातचीत से ही संभव है।