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ब्रिक्स से RIC तक, बदलता एशिया

ट्रंप के ‘अमेरिका फर्स्ट’ दौर में बदलती वैश्विक शक्ति-समीकरणों के बीच RIC की चर्चा फिर लौट आई है। नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच भारत-चीन संवाद ने एशिया की कूटनीति में सहयोग, प्रतिस्पर्धा और संतुलन की नई तस्वीर उकेरी है।

अजय पोद्दार 'अनमोल'
अजय पोद्दार 'अनमोल'
19 Sep 2026
Solar farm during sunset

डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ व्यापार नीति, व्यापक टैरिफ व्यवस्था और आर्थिक दबाव की रणनीति ने वैश्विक व्यापार और कूटनीति के सामने नई अनिश्चितताएं पैदा की हैं। अमेरिकी प्रशासन ने स्वयं अपनी व्यापार नीति को पारस्परिकता, घरेलू विनिर्माण और राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा से जोड़ा है। ऐसे वातावरण में भारत, रूस और चीन जैसी बड़ी एशियाई शक्तियों के लिए किसी एक शक्ति-केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता से बचना स्वाभाविक रणनीतिक आवश्यकता बन जाती है। इसी व्यापक संदर्भ में रूस-भारत-चीन यानी RIC की उपयोगिता पर चर्चा फिर तेज हुई है और 12–13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने इसे एक नया संदर्भ दिया है।

RIC कोई नया विचार नहीं है। दिसंबर 1998 में तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री येवगेनी प्रिमाकोव ने नई दिल्ली में रूस, भारत और चीन के बीच एक ‘रणनीतिक त्रिकोण’ की अवधारणा सामने रखी थी। उनका उद्देश्य बदलती विश्व व्यवस्था में बहुध्रुवीयता को बढ़ावा देना था। बाद में यही विचार औपचारिक सैन्य गठबंधन के बजाय तीनों देशों के बीच नियमित कूटनीतिक संवाद के रूप में विकसित हुआ। 2002 में RIC विदेश मंत्रियों की पहली बैठक हुई और यह एक नियमित परामर्श तंत्र बना। इसलिए आज RIC को किसी नए सैन्य या राजनीतिक गुट के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसका महत्व संवाद, शक्ति-संतुलन और साझा हितों पर समन्वय की संभावना में है।

नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 12 सितंबर को हुई द्विपक्षीय बैठक ने भारत-चीन संबंधों को इस पूरे विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया। दोनों नेताओं ने अगस्त 2025 में तियानजिन में हुई पिछली बैठक के बाद संबंधों में हुई प्रगति का उल्लेख किया और सीमा क्षेत्रों में शांति तथा मौजूदा समझौतों के पालन को द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए आवश्यक आधार माना। दोनों पक्षों ने सीमा प्रश्न के समाधान के लिए बातचीत जारी रखने, व्यापारिक असंतुलन और आपूर्ति-श्रृंखला संबंधी चिंताओं को संबोधित करने तथा बाजार पहुंच को अधिक पूर्वानुमेय बनाने पर भी जोर दिया।

लेकिन इस घटनाक्रम को ‘पूर्ण मेल-मिलाप’ कहना जल्दबाजी होगी। भारत और चीन के बीच संवाद और संपर्क में सुधार हुआ है, पर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं हुई है। सीमा विवाद, सुरक्षा चिंताएं, चीन-पाकिस्तान संबंध, हिंद महासागर में बदलता सामरिक परिदृश्य तथा तकनीक और आपूर्ति-श्रृंखलाओं से जुड़े प्रश्न अब भी दोनों देशों के संबंधों की सीमाएं तय करते हैं। इसलिए मौजूदा स्थिति को ‘प्रबंधित प्रतिस्पर्धा’ कहना अधिक सटीक होगा—जहां दोनों पक्ष टकराव की लागत को समझते हुए संवाद बढ़ा रहे हैं, लेकिन अपनी मूल रणनीतिक प्राथमिकताओं से पीछे नहीं हट रहे।

RIC का महत्व इसी बिंदु पर सामने आता है। यह एशिया की तीन बड़ी शक्तियों को एक ऐसे संवाद मंच पर रखता है जहां उनके हित कई मामलों में अलग होते हुए भी कुछ वैश्विक प्रश्नों पर समान या समानांतर दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है। रूस पश्चिमी दबावों के बीच एशियाई आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को विस्तार दे रहा है। चीन अमेरिका के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अपने अंतरराष्ट्रीय विकल्प बढ़ा रहा है। भारत के लिए RIC किसी गुट में शामिल होने का प्रश्न नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए विभिन्न शक्ति-केंद्रों के साथ संबंधों का संतुलन साधने का माध्यम है।

भारत का यह बहु-संरेखण उसके वर्तमान विदेश नीति व्यवहार में भी दिखाई देता है। वह अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग जारी रखता है, रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंधों को बनाए रखता है और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद के रास्ते खुले रखता है। RIC की उपयोगिता इसी लचीलेपन में है। यह भारत को अतिरिक्त कूटनीतिक विकल्प देता है, लेकिन चीन के प्रति उसकी सुरक्षा-संबंधी सतर्कता को कम करने का आधार नहीं बनता।

आर्थिक स्तर पर ब्रिक्स और RIC दोनों अवसर और चुनौतियां साथ लेकर आते हैं। विस्तारित ब्रिक्स अब वैश्विक आबादी और अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा समेटता है। ब्रिक्स के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2023 में समूह की PPP आधारित वैश्विक GDP हिस्सेदारी लगभग 39 प्रतिशत और विश्व आबादी में हिस्सेदारी 48.5 प्रतिशत थी। नई दिल्ली घोषणा ने बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार, WTO व्यवस्था को मजबूत करने तथा विकासशील देशों की आवाज और प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर भी जोर दिया।

स्थानीय मुद्राओं में वित्तपोषण और सीमा-पार भुगतान प्रणालियों पर सहयोग भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। न्यू डेवलपमेंट बैंक ने स्थानीय मुद्राओं में वित्तपोषण बढ़ाने को अपनी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है, जबकि ब्रिक्स देशों ने सीमा-पार भुगतान प्रणालियों की अधिक परस्पर-संगतता की संभावनाओं पर चर्चा जारी रखने पर सहमति व्यक्त की है। हालांकि इसका अर्थ तत्काल डॉलर-विहीन वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का निर्माण नहीं है। इसे वैकल्पिक वित्तीय साधनों और भुगतान विकल्पों के विस्तार के रूप में देखना अधिक तथ्यसम्मत होगा।

भारत-चीन आर्थिक संबंधों में सबसे बड़ी चुनौती व्यापार असंतुलन की है। नई दिल्ली में मोदी-शी वार्ता में भी दोनों पक्षों ने संरचनात्मक व्यापार असंतुलन, आपूर्ति-श्रृंखला और बाजार पहुंच से जुड़े प्रश्नों को स्वीकार किया। इसलिए आर्थिक संवाद का अर्थ बिना शर्त बाजार खोलना नहीं हो सकता। भारत के लिए निर्यात अवसर, आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षा, संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश की जांच और घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना समानांतर प्राथमिकताएं रहेंगी।

भारत-चीन संबंधों का वास्तविक परीक्षण अंततः सीमा पर होगा। शिखर सम्मेलनों की गर्मजोशी तभी स्थायी राजनीतिक परिणाम में बदल सकती है जब सीमांत क्षेत्रों में शांति बनी रहे, सैन्य और कूटनीतिक संवाद प्रभावी रहे और पूर्व सहमतियों का पालन हो। 2024 में दोनों देशों के बीच LAC पर पेट्रोलिंग व्यवस्था को लेकर समझ बनी थी और उसके बाद उच्चस्तरीय संवाद फिर सक्रिय हुआ। इसलिए आने वाले समय में सीमा स्थिरता, व्यापार संतुलन और लोगों के बीच संपर्क इस रिश्ते की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण संकेतक होंगे।

भारत को RIC को पश्चिम-विरोधी धुरी के रूप में नहीं, बल्कि संवाद और हित-संतुलन के लचीले मंच के रूप में देखना चाहिए। 18वें ब्रिक्स सम्मेलन की नई दिल्ली घोषणा ने बहुध्रुवीयता, वैश्विक शासन-सुधार और विकासशील देशों की अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया है। भारत के लिए चुनौती यही है कि वह इन मंचों का उपयोग करते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक हित और राष्ट्रीय सुरक्षा—तीनों के बीच संतुलन बनाए रखे।

RIC की चर्चा और नई दिल्ली में भारत-चीन संवाद उस बदलती दुनिया का संकेत हैं जिसमें प्रतिस्पर्धा और सहयोग अब एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि समानांतर प्रक्रियाएं बन चुके हैं। यह न किसी नए महागठबंधन का जन्म है और न भारत-चीन मतभेदों का अंत। यह संवाद की वापसी और जोखिमों को नियंत्रित करने की कूटनीति है। यदि सीमा पर स्थिरता, अधिक संतुलित व्यापार और पारस्परिक हितों पर आधारित संवाद आगे बढ़ता है, तो आज की यह सावधानीपूर्ण नरमी व्यापक एशियाई स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।