सर्दियों की आहट और मानसून की वापसी के साथ ही देश की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर (नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद) के वायुमंडल में धुंध (Smog) और प्रदूषण की चादर फिर से मंडराने लगी है। बारिश की गतिविधियां पूरी तरह थमने और हवा की गति धीमी पड़ने के कारण वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) तेजी से गिरकर 'मध्यम' से 'खराब' श्रेणी में प्रवेश कर गया है। दिल्ली के कई प्रमुख इलाकों में औसतन AQI 178 से 210 के बीच दर्ज किया गया।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के मुताबिक, आनंद विहार, मुंडका, वजीरपुर और जहांगीरपुरी जैसे पारंपरिक हॉटस्पॉट्स पर पीएम 2.5 (PM 2.5) और पीएम 10 (PM 10) का स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। तापमान में गिरावट के कारण हवा का घनत्व बढ़ रहा है, जिससे गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों की धूल और स्थानीय कचरा जलने से पैदा होने वाले प्रदूषक कण जमीन के करीब ही हवा में फंसकर रह जाते हैं।
पड़ोसी राज्यों (पंजाब और हरियाणा) में धान की फसल की कटाई शुरू होने के साथ ही पराली जलाने (Stubble Burning) की शुरुआती घटनाएं भी दर्ज की जाने लगी हैं। हालांकि प्रशासन का दावा है कि इस बार पराली प्रबंधन के लिए बायो-डीकंपोजर और सुपर-सीडर मशीनों का व्यापक उपयोग किया जा रहा है, लेकिन हवा की दिशा बदलते ही उत्तर-पश्चिम से आने वाला धुआं दिल्ली की आबोहवा को और ज्यादा जहरीला बना देता है।
बढ़ते प्रदूषण स्तर को देखते हुए दिल्ली सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने 'ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान' (GRAP) के शुरुआती चरणों को लागू करने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके तहत सड़कों पर मैकेनिकल स्वीपिंग, पानी का छिड़काव, निर्माण स्थलों पर एंटी-स्मॉग गन का अनिवार्य इस्तेमाल और बिना वैध पीयूसी (PUC) वाले वाहनों के खिलाफ चालान काटने की कार्रवाई तेज कर दी गई है।
सर्दियों के महीनों में दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण एक वार्षिक स्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले लेता है। वायु गुणवत्ता का 'खराब' श्रेणी में पहुंचना सांस और हृदय रोगियों, बुजुर्गों तथा छोटे बच्चों के लिए स्वास्थ्य संबंधी खतरे पैदा कर रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार स्थिति को बेकाबू होने से रोकने के लिए केवल सरकारी पाबंदियों पर निर्भर रहने के बजाय जनभागीदारी और सख्त प्रवर्तन की सबसे ज्यादा आवश्यकता है।