यूरोप में युद्ध की विभीषिका के बीच अब एक नया और चौंकाने वाला मोड़ आ गया है। यूक्रेन का सबसे बड़ा समर्थक और ढाल माना जाने वाला देश पोलैंड अब कीव से अपने हाथ पीछे खींचता दिख रहा है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक विवादों, सीमा पार व्यापार और कृषि उत्पाद संकट को लेकर तनाव इस कदर बढ़ चुका है कि पोलैंड की जनता में यूक्रेन के प्रति सहानुभूति खत्म होती जा रही है।
विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पोलैंड के किसानों और ट्रांसपोर्टरों ने यूक्रेन से आने वाले सस्ते अनाज और सामानों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो रहा था। इसके साथ ही, यूक्रेन के यूरोपीय संघ (EU) में संभावित प्रवेश को लेकर भी पोलैंड में भारी विरोध शुरू हो गया है। नाटो (NATO) के भीतर की यह दरार पश्चिमी गठबंधन की एकता पर सबसे बड़ा प्रहार साबित हो रही है।
रूसी तेल रिफाइनरियों पर यूक्रेन के लगातार ड्रोन हमलों और यूरोप में बढ़ती महंगाई ने आम यूरोपीय नागरिकों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। पश्चिमी देश अब तक यूक्रेन को अरबों डॉलर की सैन्य सहायता दे चुके हैं, लेकिन युद्ध का कोई नतीजा न निकलने से यूरोपीय देशों का बजट चरमरा गया है। जर्मनी और पोलैंड जैसे देशों में अब युद्ध को तुरंत समाप्त करने की मांग जोर पकड़ रही है।
भारत के दृष्टिकोण से, यूरोप के भीतर का यह मतभेद भारत के उस शुरुआती रुख को सही साबित करता है जो उसने युद्ध शुरू होने के समय अपनाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू से ही कहा था कि "यह युद्ध का युग नहीं है" और इसका समाधान केवल कूटनीति और बातचीत से ही संभव है। जब यूरोप के अपने ही देश थक रहे हैं, तब भारत की शांति की अपील अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक प्रासंगिक हो गई है।
यूरोप में घटती सैन्य सहायता और नाटो के भीतर दरार से रूस के साथ भारत के संबंध और भी संतुलित स्थिति में आ गए हैं। भारत ने हमेशा शांतिपूर्ण समाधान की वकालत की है और खुद को एक जिम्मेदार शांतिदूत के रूप में पेश किया है। यूरोप का यह आर्थिक संकट भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते (EU-India FTA) की बातचीत को भी प्रभावित कर सकता है, जहाँ भारत एक मजबूत स्थिति में मोलभाव कर रहा है।
यूरोपीय देशों में बढ़ती अंदरूनी खींचतान यह स्पष्ट संकेत दे रही है कि बिना किसी ठोस कूटनीतिक रास्ते के युद्ध को लंबे समय तक खींचना संभव नहीं है। भारत इस बदलते परिदृश्य में यूरोपीय बाजार के साथ-साथ अपनी ऊर्जा और सुरक्षा जरूरतों को बेहद समझदारी से आगे बढ़ा रहा है।
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