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मिडिल ईस्ट में महायुद्ध: तबाही?

मिडिल ईस्ट के नए संघर्ष ने पूरी दुनिया की सांसें अटका दी हैं। अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर इजराइल और क्षेत्रीय ताकतों के बीच एक बार फिर से तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। एयर स्ट्राइक, सैन्य गश्त और सीमा पार से दागे जा रहे रोकेटों ने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर में तब्दील कर दिया है। अमेरिका ने अपनी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं का हवाला देते हुए क्षेत्र में विशाल युद्धपोत और उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणालियां तैनात कर दी हैं,

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
08 Oct 2026
Solar farm during sunset

मिडिल ईस्ट के नए संघर्ष ने पूरी दुनिया की सांसें अटका दी हैं। अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर इजराइल और क्षेत्रीय ताकतों के बीच एक बार फिर से तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। एयर स्ट्राइक, सैन्य गश्त और सीमा पार से दागे जा रहे रोकेटों ने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर में तब्दील कर दिया है। अमेरिका ने अपनी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं का हवाला देते हुए क्षेत्र में विशाल युद्धपोत और उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणालियां तैनात कर दी हैं, जिससे यह साफ हो गया है कि यह जंग केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहने वाली। वैश्विक मीडिया और कूटनीतिक हलकों में इस बात की गंभीर आशंका जताई जा रही है कि एक छोटी सी सैन्य चूक पूरे पश्चिम एशिया को एक भयावह महायुद्ध में धकेल सकती है।

इस भड़कती हुई आग का सीधा असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा बाजारों पर दिखने लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पर खतरा मंडराने लगा है। तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम आसमान छूने की ओर अग्रसर हैं, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर मंदी की नई काली छाया छा गई है। पश्चिमी शक्तियां जहां युद्ध रोकने के बजाय क्षेत्रीय गुटबाजी को हवा देने में जुटी दिख रही हैं, वहीं चीन और रूस इस पूरे घटनाक्रम पर बाज जैसी नजर बनाए हुए हैं। इस वैश्विक गुटबाजी ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर दी है, जहां शांति की कोई भी अपील बारूद के धमाकों में दबकर रह जा रही है।

भारतीय परिपेक्ष्य में यह तनाव नई दिल्ली के लिए दोहरी अग्निपरीक्षा साबित हो रहा है। पहली और सबसे बड़ी चिंता खाड़ी देशों में रहने वाले 80 लाख से अधिक भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर है, जिनकी सुरक्षा और वतन वापसी की रणनीति तैयार करने में भारतीय विदेश मंत्रालय 24 घंटे जुटा हुआ है। दूसरा झटका भारत के आर्थिक हितों पर लग सकता है। भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। यदि युद्ध की वजह से तेल के दामों में भारी बढ़ोतरी होती है, तो भारत में महंगाई का स्तर बढ़ना तय है, जिसका सीधा असर देश के आम नागरिकों की जेब और विकास दर पर पड़ेगा।

व्यापार और कूटनीति के मोर्चे पर भी भारत के लिए स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। भारत के इजराइल के साथ मजबूत रणनीतिक और रक्षा संबंध हैं, जबकि ईरान और अरब देश भारत के प्रमुख ऊर्जा भागीदार और कूटनीतिक सहयोगी हैं। किसी एक का पक्ष लेना भारत के लिए अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। इसके साथ ही, भारत द्वारा प्रस्तावित इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) परियोजना पर भी अनिश्चितता के काले बादल मंडराने लगे हैं। इस कॉरिडोर का उद्देश्य भारत को यूरोप से जोड़ना था, लेकिन युद्ध के इस माहौल में इस परियोजना की गति पूरी तरह धीमी पड़ सकती है।

भारत हमेशा से संवाद और कूटनीति के जरिए शांति का पक्षधर रहा है। नई दिल्ली ने इस मोर्चे पर बेहद सधा हुआ रुख अपनाया है, जहां उसने हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री लगातार खाड़ी देशों और वैश्विक नेताओं के संपर्क में हैं ताकि स्थिति को और ज्यादा बिगड़ने से रोका जा सके। भारत का मानना है कि इस पूरे विवाद का हल केवल 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' और शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए ही निकल सकता है, न कि किसी की सैन्य श्रेष्ठता साबित करने से।

इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक राजनीति के नए समीकरण गढ़ दिए हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वैश्विक शक्तियां बातचीत की टेबल पर लौटती हैं या दुनिया एक और लंबे और खूनी संघर्ष को देखने के लिए मजबूर होगी। भारत के लिए यह समय बेहद सावधानी से कदम बढ़ाने का है, जहां उसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा, नागरिकों की सलामती और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि दुनिया किस दिशा में आगे बढ़ेगी।

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