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ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा फैसलों का सनसनीखेज आरोप!

चुनाव आयोग के भीतर से ही एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगा है कि उन्होंने आयोग के कई दूरगामी और महत्वपूर्ण फैसलों को अन्य दो चुनाव आयुक्तों को दरकिनार करके लागू किया

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
06 Oct 2026
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चुनाव आयोग के भीतर से ही एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगा है कि उन्होंने आयोग के कई दूरगामी और महत्वपूर्ण फैसलों को अन्य दो चुनाव आयुक्तों को दरकिनार करके लागू किया। इस आंतरिक मतभेद की खबर सार्वजनिक होते ही देश के प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। चुनाव आयोग जैसे बहु-सदस्यीय निकाय में इस तरह के मतभेद का बाहर आना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दुर्लभ माना जाता है।

विपक्षी पार्टियों द्वारा जारी एक संयुक्त दस्तावेज के अनुसार, मतदाता पहचान पत्रों के सत्यापन, डिजिटल ऑनलाइन वोटर फॉर्म (फॉर्म-6) के नियमों में बदलाव और चुनाव पर्यवेक्षकों की नियुक्ति से जुड़े लगभग 14 महत्वपूर्ण फैसले बिना पूर्ण बहुमत या बहु-सदस्यीय बैठक के लिए गए। विपक्ष का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने विशेषाधिकारों का अत्यधिक प्रयोग किया, जिससे संस्था की बहु-सदस्यीय संरचना का मूल उद्देश्य ही प्रभावित हुआ है।

इस विवाद के उजागर होने के बाद चुनाव आयोग के प्रशासनिक तंत्र में अभूतपूर्व तनाव देखा जा रहा है। आमतौर पर आयोग के सभी निर्णय सर्वसम्मति से या बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं। यदि तीन सदस्यों के बीच किसी नीतिगत मुद्दे पर सहमति नहीं बनती है, तो संविधान के तहत बहुमत का फैसला मान्य होता है। हालांकि, इन आरोपों में कहा गया है कि मामला औपचारिक चर्चा के लिए मेज पर ही नहीं लाया गया और फाइलों को सीधे स्वीकृत कर दिया गया।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में, यह मामला बेहद गंभीर रूप धारण कर चुका है। भारत की विशाल आबादी और जटिल चुनावी प्रक्रिया को देखते हुए चुनाव आयोग के निर्णयों की विश्वसनीयता अचूक होनी चाहिए। जब आयोग के भीतर ही निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठने लगें, तो इससे चुनाव परिणामों की निष्पक्षता पर भी विपक्षी दल प्रश्नचिह्न लगाने लगते हैं। यही कारण है कि इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों का गुस्सा चरम पर है।

सरकार के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह केवल नियमित प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हिस्सा है और इसे बेवजह राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। उनके मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त के पास प्रशासनिक प्रमुख होने के नाते त्वरित फैसले लेने का अधिकार होता है, ताकि चुनावी तैयारियों में किसी प्रकार की देरी न हो। उन्होंने विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं की साख को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया है।

बहरहाल, इस विवाद ने भारत के निर्वाचन तंत्र की आंतरिक कार्यप्रणाली को जनता की अदालत में लाकर खड़ा कर दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सामने अब इस प्रशासनिक गतिरोध को दूर करने और संस्था की पारदर्शिता व निष्पक्षता की साख को पुनः स्थापित करने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

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