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महायुद्ध के मुहाने पर मध्य पूर्व: क्या फिर बहेगा तेल का लाल समंदर?

पश्चिम एशिया की धरा एक बार फिर बारूद की गंध और मिसाइलों की गड़गड़ाहट से कांप उठी है। तनाव की यह नई ज्वाला सिर्फ सीमावर्ती झड़पों तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि इसने पूरे वैश्विक आर्थिक ताने-बाने को अपनी चपेट में ले लिया है। इस बार संघर्ष के तार सीधे तौर पर दुनिया की सबसे संवेदनशील तेल आपूर्ति लाइनों से जुड़ चुके हैं।

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
06 Oct 2026
Solar farm during sunset

पश्चिम एशिया की धरा एक बार फिर बारूद की गंध और मिसाइलों की गड़गड़ाहट से कांप उठी है। तनाव की यह नई ज्वाला सिर्फ सीमावर्ती झड़पों तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि इसने पूरे वैश्विक आर्थिक ताने-बाने को अपनी चपेट में ले लिया है। इस बार संघर्ष के तार सीधे तौर पर दुनिया की सबसे संवेदनशील तेल आपूर्ति लाइनों से जुड़ चुके हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि स्थिति को समय रहते संभाला नहीं गया, तो यह तीसरे विश्व युद्ध की आहट साबित हो सकती है।

तनाव की मुख्य वजह क्षेत्रीय शक्तियों के बीच गहराता अविश्वास और सैन्य जमावड़ा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है, वहां युद्धपोतों की तैनाती बढ़ा दी गई है। वाणिज्यिक जहाजों पर बढ़ते हमलों और संभावित नाकेबंदी की आशंका ने शिपिंग कंपनियों की नींद उड़ा दी है। सुरक्षा विशेषज्ञ इस बात से चिंतित हैं कि इस बार का संघर्ष पारंपरिक युद्ध से कहीं आगे बढ़कर ड्रोन और साइबर वारफेयर के एक घातक संयोजन में बदल चुका है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही मुद्रास्फीति और सुस्त विकास दर से जूझ रही है, ऐसे में यह नया संकट आग में घी डालने जैसा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रातों-रात आसमान छूने लगी हैं। आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले व्यवधान से न केवल ईंधन महंगा होगा, बल्कि दुनिया भर में खाद, रसायन और विमानन क्षेत्र पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा। पश्चिमी देश इस वक्त कूटनीतिक रास्तों से शांति बहाल करने का दावा तो कर रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखें तो यह घटनाक्रम नई दिल्ली के लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। तेल की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी भारत के चालू खाते के घाटे (CAD) को बिगाड़ सकती है और देश के भीतर पेट्रोल-डीजल की दरों को बढ़ा सकती है। केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश की ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने के साथ-साथ घरेलू महंगाई पर लगाम लगाना होगी।

इसके अतिरिक्त, इस क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 80 लाख से अधिक भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भारत सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। मध्य पूर्व के देशों से भारत आने वाला विदेशी धन (Remittance) देश की अर्थव्यवस्था का एक मुख्य आधार है। यदि वहां संकट गहराता है, तो न केवल इन भारतीयों की वापसी की चुनौती खड़ी होगी, बल्कि देश में आने वाली विदेशी मुद्रा में भी भारी गिरावट आ सकती है। भारत के लिए इस वक्त कूटनीतिक संतुलन बनाना बेहद नाजुक काम हो गया है।

भारत के लिए यह संकट जहां एक तरफ बड़ा जोखिम लेकर आया है, वहीं अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को साबित करने का अवसर भी है। भारत के संबंध इजराइल और अरब देशों, दोनों के ही साथ बेहद मजबूत हैं। ऐसे में नई दिल्ली एक तटस्थ और सम्मानित मध्यस्थ के रूप में उभर सकती है। बहरहाल, भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति में विविधता लाने और रूस व अन्य देशों से कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए तुरंत कड़े कदम उठाने होंगे, ताकि देश इस वैश्विक भूचाल से सुरक्षित निकल सके।

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