पूर्वी यूरोप का युद्धक्षेत्र एक बार फिर अत्यधिक खौफनाक मोड़ ले चुका है। नाटो की सीमाओं से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर परमाणु-सक्षम मिसाइलों और उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों की नई तैनाती ने पूरे यूरोपीय महाद्वीप को हिलाकर रख दिया है। युद्ध की शुरुआत को वर्षों बीत जाने के बाद भी यह संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा, बल्कि अब इसमें गैर-पारंपरिक और सामरिक परमाणु हथियारों (Tactical Nuke) के इस्तेमाल की धमकियां सीधे तौर पर दी जाने लगी हैं।
नाटो सदस्य देशों ने अपनी सीमाओं पर युद्धस्तर पर अलर्ट जारी कर दिया है। पूर्वी यूरोप के देशों में अतिरिक्त बटालियनों की तैनाती की जा रही है और हवाई क्षेत्र की निगरानी बढ़ा दी गई है। पश्चिमी देशों द्वारा दिए जा रहे आधुनिक हथियारों और लंबी दूरी की मिसाइलों के जवाब में, विरोधी खेमे ने भी अपनी युद्ध रणनीति को और अधिक आक्रामक बना दिया है। दोनों ही पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, जिससे शांति वार्ता के सारे दरवाजे फिलहाल पूरी तरह से बंद दिखाई दे रहे हैं।
यह युद्ध अब सिर्फ दो देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने वैश्विक ऊर्जा और खाद्य बाजारों पर करारी चोट पहुंचाई है। यूरोप में गैस आपूर्ति का संकट गहराता जा रहा है, जिससे यूरोपीय उद्योगों की लागत में भारी इजाफा हुआ है। वहीं, ब्लैक सी (काला सागर) के रास्ते अनाज के निर्यात पर मंडराते खतरे ने कई विकासशील और गरीब देशों में भुखमरी का संकट पैदा कर दिया है। पूरे यूरोप में शरणार्थी संकट और मुद्रास्फीति के कारण जन असंतोष चरम पर पहुंच गया है।
भारत के लिए यह संघर्ष एक बहुत ही जटिल कूटनीतिक संतुलन की मांग करता है। युद्ध की शुरुआत से ही भारत ने शांति, संवाद और कूटनीति का आह्वान किया है। भारत पर पश्चिमी देशों का लगातार यह दबाव रहा है कि वह मॉस्को के खिलाफ सख्त रुख अपनाए, लेकिन नई दिल्ली ने अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और गुटनिरपेक्षता की नीति को सर्वोपरि रखा है। रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदकर भारत ने अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को तो संभाल लिया, लेकिन नाटो देशों के साथ रिश्तों में संतुलन बनाए रखना एक चुनौती बनी हुई है।
इस युद्ध के कारण भारत की रक्षा आपूर्ति श्रृंखला पर भी असर पड़ा है। भारतीय सशस्त्र बलों के कई महत्वपूर्ण हथियार और कलपुर्जे रूस से आते हैं। युद्ध में रूसी रक्षा उद्योग के व्यस्त होने के कारण भारत को अपने रक्षा साजो-सामान के रखरखाव और समय पर डिलीवरी में दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। इस स्थिति ने भारत को अपने रक्षा क्षेत्र में 'आत्मनिर्भरता' को बढ़ावा देने और फ्रांस व अमेरिका जैसे अन्य देशों से रक्षा उपकरण खरीदने की प्रक्रिया को और तेज करने के लिए प्रेरित किया है।
भारत के प्रधानमंत्री ने दुनिया के सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि "यह युग युद्ध का नहीं है।" भारत इस समय एक ऐसे वैश्विक मंच पर खड़ा है जहां वह पश्चिम और पूर्व के बीच एक मजबूत पुल का काम कर सकता है। ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर भारत इस बात पर जोर दे रहा है कि युद्ध का खामियाजा गरीब और विकासशील देशों को न भुगतना पड़े। आने वाले समय में भारत की यह तटस्थ लेकिन प्रभावकारी कूटनीति ही उसे दुनिया के प्रमुख वैश्विक मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर सकती है।
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