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यूक्रेन युद्ध में नया मोड़!

पूर्वी यूरोप में जारी रूस और यूक्रेन का युद्ध एक बार फिर बेहद खतरनाक और अप्रत्याशित मोड़ पर पहुंच गया है। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के रणनीतिक और बुनियादी ढांचे पर अपने हमले कई गुना तेज कर दिए हैं। यूक्रेन ने पश्चिमी देशों से मिली लंबी दूरी की मिसाइलों और एडवांस्ड ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल कर रूसी क्षेत्र के भीतर स्थित सैन्य ठिकानों और ऊर्जा संयंत्रों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
08 Oct 2026
Solar farm during sunset

पूर्वी यूरोप में जारी रूस और यूक्रेन का युद्ध एक बार फिर बेहद खतरनाक और अप्रत्याशित मोड़ पर पहुंच गया है। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के रणनीतिक और बुनियादी ढांचे पर अपने हमले कई गुना तेज कर दिए हैं। यूक्रेन ने पश्चिमी देशों से मिली लंबी दूरी की मिसाइलों और एडवांस्ड ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल कर रूसी क्षेत्र के भीतर स्थित सैन्य ठिकानों और ऊर्जा संयंत्रों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। इसके जवाब में रूस ने यूक्रेन के प्रमुख शहरों और बिजली ग्रिडों पर भारी मिसाइल हमलों की बौछार कर दी है। कड़ाके की ठंड से ठीक पहले हुए इन हमलों ने यूक्रेन के बड़े हिस्से को अंधेरे और तबाही के साये में धकेल दिया है।

नाटो (NATO) देशों ने यूक्रेन को अत्याधुनिक सैन्य सहायता और अरबों डॉलर की आर्थिक मदद जारी रखने की कसम खाई है, जिससे शांति वार्ता की तमाम संभावनाएं ध्वस्त होती दिख रही हैं। रूस ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने द्वारा कब्जाए गए क्षेत्रों से पीछे नहीं हटेगा, जबकि यूक्रेन अपनी पूरी जमीन वापस पाने की शर्त पर अड़ा हुआ है। इस हठधर्मिता ने युद्ध को एक कभी न खत्म होने वाले दलदल में बदल दिया है, जिससे न केवल यूरोप बल्कि पूरी दुनिया में मानवीय और आर्थिक संकट गहराता जा रहा है।

भारत के लिए इस युद्ध का लंबा खिंचना कूटनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर एक बड़ा धर्मसंकट बना हुआ है। युद्ध की शुरुआत से ही भारत ने किसी भी गुट में शामिल होने से इनकार किया है और अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है। भारत ने रूस से भारी छूट पर कच्चा तेल खरीदकर अपने देशवासियों को महंगाई की मार से बचाया है, लेकिन इसके चलते पश्चिमी देशों का दबाव भी भारत पर लगातार बढ़ता रहा है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह रूस जैसे अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्त को खोए बिना अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ अपने मजबूत आर्थिक और तकनीकी संबंधों को कैसे संतुलित रखे।

खाद्यान्न और उर्वरक सुरक्षा के मामले में भी यह युद्ध भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है। रूस और यूक्रेन दोनों ही वैश्विक स्तर पर गेहूं, सूरजमुखी के तेल और रासायनिक उर्वरकों के सबसे बड़े निर्यातकों में से हैं। युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने से वैश्विक बाजारों में कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। भारत को अपने कृषि क्षेत्र को सुचारू रूप से चलाने और देश के करोड़ों किसानों को सस्ती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए लगातार नए रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं।

भारत ने इस संकट के समाधान के लिए एक वैश्विक शांतिदूत की भूमिका निभाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि "यह युग युद्ध का नहीं है।" भारत ने कई मौकों पर रूस और यूक्रेन दोनों के शीर्ष नेतृत्व से सीधी बात की है और बातचीत की मेज पर वापस लौटने का आग्रह किया है। विश्व स्तर पर यह माना जा रहा है कि भारत ही एक ऐसा देश है, जिसके संबंध मास्को और कीव दोनों के साथ अच्छे हैं, और वह इस युद्ध को खत्म करवाने में एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।

यूक्रेन का यह खूनी संघर्ष यह साबित करता है कि आधुनिक दौर के युद्धों में जीत किसी की नहीं होती, बल्कि तबाही पूरे विश्व को झेलनी पड़ती है। भारत की विदेश नीति की वैश्विक स्तर पर सराहना हो रही है क्योंकि उसने दबाव में आए बिना स्वतंत्र और शांति-समर्थक रुख बरकरार रखा है। लेकिन यह युद्ध जितना लंबा चलेगा, वैश्विक शांति और आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौतियां उतनी ही जटिल होती जाएंगी।

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