ताइवान जलडमरूमध्य में बीते चौबीस घंटों के भीतर सैन्य हलचल अचानक अपने सबसे खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। चीन के दर्जनों लड़ाकू विमानों और युद्धपोतों ने एक साथ अंतरराष्ट्रीय समुद्री रेखा को लांघते हुए ताइवान की घेराबंदी मजबूत कर दी है। पेंटागन के रडार ने इस असाधारण गतिविधि को तुरंत ट्रैक किया, जिसके बाद अमेरिकी नौसेना ने भी अपने सातवें बेड़े को अलर्ट मोड पर डाल दिया है। अचानक बढ़ी इस सैन्य तैनाती से पूरे पूर्वी एशिया में तनाव चरम पर पहुंच गया है और क्षेत्र में कभी भी बड़ा टकराव छिड़ने की आशंका गहरा गई है।
ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर पुष्टि की है कि चीनी जेट्स ने उनकी वायु रक्षा पहचान क्षेत्र (ADIZ) में कई बार घुसपैठ की। बीजिंग की इस आक्रामक हरकत को केवल एक नियमित सैन्य अभ्यास नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे किसी बड़े संभावित हमले की पूर्व-तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। चीनी ड्रैगन के इस सख्त रुख के पीछे उसकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक दबाव की नीति काम कर रही है। ताइवान की संप्रभुता पर मंडराता यह खतरा अब वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
विश्वसनीय विदेशी रक्षा पोर्टल्स और पश्चिमी विश्लेषकों का मानना है कि चीन का यह कदम वाशिंगटन और उसके सहयोगियों को सीधी चुनौती देने के लिए उठाया गया है। पेंटागन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि क्षेत्र में शक्ति संतुलन बिगाड़ने की कोई भी एकतरफा कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप की ताइवान जलडमरूमध्य की ओर आवाजाही ने बीजिंग में भी हलचल तेज कर दी है। दोनों महाशक्तियों के बीच सीधा टकराव अब किसी काल्पनिक खतरे की जगह बेहद वास्तविक नजर आने लगा है।
इस भड़कती आग से अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह चरमराने के कगार पर पहुंच सकती है। ताइवान दुनिया का सबसे बड़ा सेमीकंडक्टर निर्माण केंद्र है, जहां बनने वाली चिप्स पर पूरी दुनिया की तकनीक, ऑटोमोबाइल और रक्षा उद्योग टिके हैं। यदि इस क्षेत्र में युद्ध छिड़ता है, तो वैश्विक टेक इंडस्ट्री रातों-रात ठप पड़ सकती है। दुनिया भर के शेयर बाजारों में पहले ही इस तनाव का खौफ साफ देखने को मिल रहा है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी संकट के बादल छा गए हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का यह आक्रामक उभार नई दिल्ली के लिए बेहद संवेदनशील मामला है। ताइवान पर चीन का पूर्ण नियंत्रण होते ही हिंद महासागर में भी ड्रैगन का दबाव कई गुना बढ़ जाएगा। इसके अलावा, वैश्विक चिप सप्लाई ठप होने से भारत का महत्वाकांक्षी टेक और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर सीधे प्रभावित हो सकता है। भारत को न केवल अपनी समुद्री सीमाओं को लेकर अतिरिक्त चौकन्ना रहना होगा, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला के इस संभावित संकट से निपटने के लिए भी त्वरित रणनीति बनानी होगी।
ताइवान की यह जलती हुई सीमा केवल दो देशों का विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की अंतिम परीक्षा बन चुकी है। वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक कूटनीतिक गलियारों में देर रात तक बैठकों का दौर जारी है। अगर अगले कुछ घंटों में दोनों पक्षों की ओर से संयम नहीं दिखाया गया, तो तीसरे विश्वयुद्ध की आहट को रोकना असंभव हो जाएगा। पूरी दुनिया की सांसें इस समय ताइवान स्ट्रेट पर टिकी हैं, जहां एक छोटी सी चूक भी महाविनाश का कारण बन सकती है।
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