दिल्ली के सत्ता के गलियारों से आज एक और बेहद सनसनीखेज और झकझोर देने वाली खबर सामने आई, जब इस राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन का समर्थन करने पहुंचे देश के दिग्गज नेताओं को भी पुलिस ने नहीं बख्शा। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उनके लोधी एस्टेट स्थित आवास के बाहर से ही भारी पुलिस बल ने बलपूर्वक हिरासत में ले लिया। ठीक इसी प्रकार, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को भी जंतर-मंतर रोड पर केरल हाउस के पास से उस वक्त उठा लिया गया जब वे शांतिपूर्ण तरीके से बात कर रहे थे।
इस ताबड़तोड़ और बेलगाम पुलिसिया कार्रवाई के बाद देश के राजनीतिक आसमान पर भारी भूचाल आ गया है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तथा कई अन्य प्रमुख विपक्षी सांसद भी अपने आवास के बाहर धरने पर बैठने को मजबूर हो गए। विपक्षी दलों के नेताओं ने केंद्र सरकार पर सीधा और तीखा प्रहार करते हुए इसे देश में अघोषित आपातकाल और फासीवाद का नाम दिया है। उनका साफ कहना है कि सरकार विपक्ष की हर सुलगती आवाज और जनता के आक्रोश को दबाने के लिए पुलिस तंत्र का खुलकर दुरुपयोग कर रही है।
इस हाई-प्रोफाइल ड्रामे के दौरान दिल्ली की सड़कों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जबरदस्त राजनीतिक रस्साकशी देखने को मिली, जिससे आम लोगों में भी भारी गहमागहमी फैल गई। सुरक्षा बलों ने उन तमाम इलाकों को छावनी में बदल दिया जहां विपक्षी नेताओं के जमा होने की थोड़ी सी भी आशंका थी। पुलिस की गाड़ियां सायरन बजाती हुई एक जगह से दूसरी जगह दौड़ती रहीं, और नेताओं के समर्थकों ने भी पुलिस की इस तानाशाही के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। इस पूरे घटनाक्रम ने राष्ट्रीय राजधानी के राजनीतिक तापमान को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया।
एक इंसानी नजरिए से सोचिए कि जिस देश में जनप्रतिनिधियों और मुख्यमंत्रियों तक को इस तरह सड़कों पर पुलिस बल के दम पर घसीटा और नजरबंद किया जाए, उस देश के एक आम नागरिक की सुरक्षा और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या हश्र होता होगा? दिल्ली की इन खामोश सड़कों पर आज सत्ता और विपक्ष के बीच चल रही इस लुकाछिपी ने राजनीति के उन बदसूरत पहलुओं को बेनकाब कर दिया है जहां आम इंसान की चीख की कोई कीमत नहीं रह जाती। पुलिस की गाड़ियों में ठूंसकर ले जाए जा रहे इन नेताओं के चेहरे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि माहौल कितना घुटन भरा है।
यह घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश की संघीय व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाएं आज एक अत्यंत नाजुक दौर से गुजर रही हैं। राज्यों के मुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं के साथ इस तरह का बर्ताव न केवल राजनीतिक मर्यादाओं का उल्लंघन है, बल्कि यह देश के संविधान निर्माताओं द्वारा रची गई लोकतांत्रिकिक परम्पराओं पर भी एक करारा प्रहार है। जब देश की दिशा तय करने वाले शीर्ष नेतृत्व को ही इस तरह रास्तों में रोक दिया जाएगा, तो आम जनता अपनी फरियाद लेकर आखिर किसके पास जाएगी।
आने वाले वक्त में यह गिरफ्तारियां देश की राजनीति का नक्शा पूरी तरह बदल सकती हैं और विपक्षी दलों को एकजुट होकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का एक बहुत बड़ा बहाना मिल गया है। जनता के बीच भी इस बात को लेकर तीखी चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं कि क्या देश अब सचमुच एक ऐसे रास्ते पर निकल पड़ा है जहां असहमति की हर आवाज को अपराध मान लिया जाएगा। इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में देश के राजनीतिक भविष्य की रूपरेखा तय करेंगे।
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